छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तेजो ब्रह्मवर्चसम्, तेजस्तु केवलं त्विड्भावः । अन्नादो दीप्ताग्निः । न प्रत्यङ्ङग्नेरभिमुखो नाचामेन भक्षयेत्किञ्चिन्न निष्ठीवेच्च श्लेष्मनिरसनं च न कुर्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज 'ब्रह्मवर्चस्' कहलाता है, केवल तेज तो त्विङ्-भाव ( कान्ति ) का नाम है। 'अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। अग्निकी ओर मुख करके आचमन यानो कुछ भी भक्षण न करे और न निष्ठीवन—श्लेष्मा ( कफ ) का ही त्याग करे—यह व्रत है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
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त्रयोदश खण्ड
वामदेव्यसामकी उपासना
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् १
पुरुष जो संकेत करता है, वह हिंकार है; जो तोष देता (प्रसन्न करनेके लिये मीठी बातें कहता) है, वह प्रस्ताव है; स्त्रीके साथ जो सोता है वह उद्गीथ है; अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन (अनुकूल बर्ताव) करता है, वह प्रतिहार है; मिथुनद्वारा जो समय बिताता है, वह निधन है; मैथुन आदि क्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह भी निधन ही है, यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओत-प्रोत है ॥ १ ॥
| उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः। ज्ञपयते तोषयति स प्रस्तावः। सहशयनमेकपर्यङ्कगमनं स उद्गीथः श्रैष्ठ्यात्। प्रतिस्त्रीं | पुरुष जो उपमन्त्रण—संकेत करता है, वह प्रथम होनेसे हिंकार है। जो ज्ञापन करता—मीठी बातें कह-कर तोष देता है, वह प्रस्ताव है। स्त्री-पुरुषका जो साथ सोना—एक शय्यापर जाना है, वह उद्गीथ है, क्योंकि उत्तम |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९१
| शयनं स्त्रियोऽभिमुखीभावः स प्रतिहारः। कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम् । एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्, वाय्वम्बुमिथुनसम्बन्धात् ॥१॥ | सन्तानकी प्राप्तिका हेतु होनेके कारण) वह उत्कृष्ट है। अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन करना—सम्मुख या अनुकूल होना है, वह प्रतिहार है। पुरुष मिथुनद्वारा जो समय बिताता है तथा मैथुनक्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओतप्रोत है; क्योंकि वायु और जलके मिथुन (जोड़े) से इसका सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |
स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुनमें ओतप्रोत जानता है, वह मिथुनवान् (दाम्पत्य-सुखसे सम्पन्न) होता है, प्रत्येक मैथुनसे संतानको जन्म देता है। सारी आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन बिताता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। जिस उपासकके अनेक पत्नियाँ हों वह उनमेंसे किसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेव्योपासकका) व्रत है ॥ २ ॥
| स य इत्यादि पूर्ववत्। मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः। मिथुनान्मिथुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते। न काञ्चन काञ्चिदपि स्त्रियंस्वात्मन्नन्यप्राप्तां न परिहरेत्स- | 'स यः' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है। मिथुनवान् होता है अर्थात् कभी विधुर (पत्नीके संयोग-सुखसे वञ्चित) नहीं होता है। मिथुन-मिथुनसे संतानको जन्म देता है, इस कथनके द्वारा उसकी अमोघवीर्यता बतायी जाती है। अपनी बहुत-सी स्त्रियोंमेंसे जो कोई जब कभी समागमकी इच्छा लेकर अपनी शय्यापर आ जाय, उसका परित्याग न |