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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

१५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

१५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥

इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'हमारा साम (शुभ हुआ)। अर्थात् जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते हैं; और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जब अशुभ होता है तो 'ओह ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥

| अथोताप्याहुः स्वसंवेद्यं साम नोऽस्माकं बतेत्यनुकम्पयन्तः संवृत्तमित्याहुः । एतच्चैरुक्तं भवति यत् साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुः । विपर्यये जातेऽसाम नो बतेति । यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः । तस्मात्सामसाधुशब्दयोरेकार्थत्वं सिद्धम् ॥ ३ ॥ | इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'अहा ! वह स्वयं ही अनुभव करने योग्य साम हमें प्राप्त हो गया है।' 'बत' इस निपातका आशय यह है कि वे अनुकम्पा करते हुए कहते हैं। अर्थात् उनके द्वारा यह प्रतिपादित होता है कि जो साधु होता है वही 'अहा ! यह साधु है' ऐसा कहा जाता है तथा विपरीत होनेपर 'ओह ! हमारे लिये यह असाम है' ऐसा कहते हैं। जो असाधु होता है वही 'ओह ! यह असाधु (बुरा) है' ऐसा कहा जाता है। इससे साम और साधु शब्दोंकी एकार्थता सिद्ध होती है ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

स य एतदेवं विद्वान्साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनग्ँसाधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥४॥

इसे ऐसे जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' इस प्रकार उपासना करता है उसके पास, जो साधु धर्म हैं वे शीघ्र ही आ जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ ४ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३


| अतः स यः कश्चित्साधु सामेति साधुगुणवत्सामेत्युपास्ते समस्तं साम साधुगुणवद्विद्वांस्तस्यैतत्फलम् अभ्याशो ह क्षिप्रं ह, यदिति क्रियाविशेषणार्थम्, एनमुपासकं साधवः शोभना धर्माः श्रुतिस्मृत्यविरुद्धा आ च गच्छेयुरागच्छेयुश्च । न केवलमागच्छेयुरुप च नमेयुरुपनमेयुश्च भोग्यत्वेनोपतिष्ठेरित्यर्थः ॥ ४ ॥ | अतः वह जो कोई पुरुष साम साधु है यानी साम साधुगुणविशिष्ट है-ऐसी उपासना करता है अर्थात् समस्त सामको साधु गुणवाला जानता है उसे यह फल मिलता है, इस उपासकको जो श्रुति-स्मृतिसे अविरुद्ध शुभ धर्म हैं, वे अभ्यास अर्थात् शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ जो 'यत्' पद है वह क्रियाविशेषणके लिये है। केवल प्राप्त ही नहीं होते उसके प्रति विनम्र भी हो जाते हैं, अर्थात् भोग्यरूपसे उपस्थित हो जाते हैं।४। |


इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

लोकविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना

| कानि पुनस्तानि साधुदृष्टिविशिष्टानि समस्तानि सामान्युपास्यानि ? इति, इमानि तान्युच्यन्ते लोकेषु पञ्चविधमित्यादीनि । | फिर वे साधुदृष्टिविशिष्ट उपासना करने योग्य समस्त साम कौन-से हैं? ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं--वे 'लोकेषु पञ्चविधम्' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार बतलाये जाते हैं- |

लोकेषु पञ्चविधँसामोपासीत पृथिवी हिंकारः । अग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥

ऊपरके लोकोंमें निम्नाङ्कितरूपसे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है ॥ १ ॥

| [साम्नि द्विधा दृष्टौ विरोधोद्भावनम्]<br><br>ननु लोकादिदृष्ट्या तान्युपास्यानि साधुदृष्ट्या चेति विरुद्धम् । | **शंका—**किंतु उन समस्त सामोंकी लोकादिदृष्टिसे तथा साधुदृष्टिसे भी उपासना करनी चाहिये—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है ? |
| [विरोधपरिहारः]<br><br>न, साध्वर्थस्य लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वात्, मृदादिवद्घटादिविकार्येषु । साधुशब्दवाच्योऽर्थो धर्मो ब्रह्म वा सर्वथापि लोकादिकार्येष्वनुगतम् । अतो | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका आदि अपने विकार घटादिमें अनुगत होते हैं उसी प्रकार [ सबका ] कारणभूत साधु पदार्थ लोकादि कार्यवर्गमें अनुगत है। साधुशब्दका वाच्यार्थ धर्म अथवा ब्रह्म सभी प्रकारसे लोकादि कार्यवर्गमें व्याप्त है । अतः जिस |

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१५५

संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी (भाष्यार्थ)
यथा यत्र घटादिदृष्टिर्मृदादिदृष्ट्यनुगतैव सा, तथा साधुदृष्ट्यनुगतैव लोकादिदृष्टिः, धर्मादिकार्यत्वाल्लोकादीनाम् । यद्यपि कारणत्वमविशिष्टं ब्रह्मधर्मयोः, तथापि धर्म एव साधुशब्दवाच्य इति युक्तम्, साधुकारी साधुर्भवतीति धर्मविषये साधु शब्दप्रयोगात् ।प्रकार जहाँ घटादिदृष्टि होती है वहाँ वह मृत्तिकादिदृष्टिसे अनुगत ही होती है, उसी प्रकार लोकादिदृष्टि भी साधुदृष्टिसे अनुगत ही होती है; क्योंकि ये लोकादि धर्मादिके कार्य ही होते हैं । यद्यपि ब्रह्म और धर्मका प्रपञ्चकारणत्व तो समान है तो भी 'साधु' शब्दका वाच्य धर्म ही है—ऐसा मानना ठीक है; क्योंकि 'साधु करनेवाला साधु होता है' इस प्रकार--धर्मके विषयमें ही 'साधु' शब्दका प्रयोग किया गया है ।
(लोकादिदृष्ट्यनुशासनवैयर्थ्या-शङ्का)<br>ननु लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वादर्थप्राप्तैव तद्दृष्टिरिति 'साधु सामेत्युपास्ते' इति न वक्तव्यम् ।शंका--लोकादि कार्योंमें उनका कारण अनुगत होनेके कारण उसमें साधुदृष्टि होना तो स्वतः सिद्ध है । ऐसी अवस्थामें 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करता है' यह नहीं कहना चाहिये था ।
(तन्निरसनम्)<br>न, शास्त्रगम्यत्वात्तद् दृष्टेः । सर्वत्र हि शास्त्रार्पिता एव धर्मा उपास्या न विद्यमाना अप्यशास्त्रीयाः ।समाधान--नहीं, क्योंकि वह दृष्टि शास्त्रसे ही प्राप्त हो सकती है । सभी जगह शास्त्रविहित धर्म ही उपासनीय होते हैं, अशास्त्रीय धर्म विद्यमान रहनेपर भी उपासनीय नहीं होते ।
लोकेषु पृथिव्यादिषु पञ्चविधं पञ्चभक्तिभेदेन पञ्चप्रकारं साधु समस्तं सामोपासीत । कथम् ? पृथिवी हिंकारः । लोकेष्विति या सप्तमी तां प्रथ-पृथिवी आदि लोकोंमें पञ्चविध--पाँच प्रकारकी भक्तिके भेदसे पाँच प्रकारके साधुगुणविशिष्ट समस्त सामकी उपासना करनी चाहिये । सो किस प्रकार ? [यह बतलाते हैं-] पृथिवी हिंकार है। 'लोकेषु' इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे प्रथमा