छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यथासंकल्पमेव नामरूपे व्याकरोदसौ नामायमिदंरूप इति ॥ ३ ॥ | व्याकरण किया । अर्थात् यह पदार्थ इस नामवाला और इस रूपवाला है—इस प्रकार पदार्थोंका व्यक्तीकरण किया ॥ ३ ॥ |
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ४ ॥
उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ ४ ॥
| तासां च देवतानां गुणप्रधानभावेन त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत्कृतवती देवता । तिष्ठतु तावद्देवतापिण्डानां नामरूपाभ्यां व्याकृतानां तेजोऽबन्नमयत्वेन त्रिधात्वं यथा तु बहिरिमाः पिण्डेभ्यस्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे मम निगदतो विजानीहि विस्पष्टमवधारयोदाहरतः ॥ ४ ॥ | उस देवताने उन देवताओंमेंसे एक-एकको गुण-प्रधानभावसे त्रिवृत्-त्रिवृत किया । अभी, नामरूपसे व्यक्त हुए देवता आदि पिण्डोंके तेज, अप् और अन्नरूपसे त्रिविधत्वकी बात अलग रहे, इन पिण्डोंसे बाहर भी ये तीनों देवता एक-एक करके किस प्रकार त्रिवृत्-त्रिवृत हैं सो मेरे कथनद्वारा जान अर्थात् उदाहरणद्वारा अच्छी तरह समझ ले ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
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एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान
| यत्तद्देवतानां त्रिवृत्करणमुक्तं तस्यैवोदाहरणमुच्यते, उदाहरणं नामैकदेशप्रसिद्ध्याशेषप्रसिद्धयर्थमुदाह्रियत इति । तदेतदाह— | उन देवताओंका जो त्रिवृत्करण कहा गया है, उसका उदाहरण दिया जाता है । उदाहरण उसे कहते हैं, जो एक देशकी प्रसिद्धि-द्वारा सम्पूर्ण देशकी प्रसिद्धिके लिये कहा जाता है । श्रुति वही उदाहरण देती है— |
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यदग्ने रोहितꣳरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥
अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्नका है । इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥१॥
| यदग्नेस्त्रिवृत्कृतस्य रोहितं रूपं प्रसिद्धं लोके तदत्रिवृत्कृतस्य तेजसो रूपमिति विद्धि । तथा यच्छुक्लं रूपमग्नेरेव तदपामत्रिवृत्कृतानां यत्कृष्णं तस्यैवाग्ने रूपं तदन्नस्य पृथिव्या अत्रिवृत्कृताया इति विद्धि । | लोकमें त्रिवृत्कृत ( तीन तत्त्वोंसे मिश्रित ) अग्निका जो रोहित रूप प्रसिद्ध है वह अत्रिवृत्कृत ( केवल ) तेजका रूप है—ऐसा जानो । तथा उस अग्निका ही जो शुक्ल रूप है वह तीन तत्त्वोंके सम्मिश्रणसे रहित केवल जलका है और उसीका जो कृष्ण रूप है वह अन्नका—अत्रिवृत्कृत पृथिवीका रूप है—ऐसा जानो । |
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