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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

१०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

१०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| स्थानभेदाद्रूपगुणनामातिदेशादीशितृत्वविषयभेदव्यपदेशाच्चादित्यचाक्षुषयोर्भेद इति चेत् ?<br><br>न; अमुनानेनैवेत्येकस्योभयात्मप्राप्त्यनुपपत्तेः । | यदि कहो कि आश्रयका भेद होनेसे, [ आदित्यान्तर्गत पुरुषके ] रूप, गुण और नामका ( चाक्षुष पुरुषमें ) अतिदेश¹ होनेसे तथा ईशितृत्व ( शासन ) के विषयोंका भेद बतलाये जानेके कारण आदित्य और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंका भेद है— तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेपर [ मन्त्र ७ और ८ में ] 'अमुना' 'अनेनैव' इन शब्दोंसे प्रतिपादित एकके ही द्वारा दोनोंकी प्राप्ति सम्भव नहीं होगी । |
| द्विधाभावेनोपपद्यत इति चेत्, वक्ष्यति हि "स एकधा भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, न, चेतनस्यैकस्य निरवयवत्वाद् द्विधाभावानुपपत्तेः। तस्मादध्यात्ममधिदैवतयोरेकत्वमेव ।<br><br>यत्तु रूपाद्यतिदेशो भेदकारणमवोचो न तद्भदावगमाय । किं तर्हि ? स्थानभेदाद् भेदाशङ्का मा भूदित्येवमर्थम् ॥ ५ ॥ | यदि कहो कि वह उन दोनोंको दो रूपसे प्राप्त होता है, जैसा कि "वह एकरूप होता है, वह तीन रूप होता है" इत्यादि रूपसे श्रुति कहेगी भी—तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि निरवयव होनेके कारण एक ही चेतनका दो रूप होना सम्भव नहीं है । अतः अध्यात्म और अधिदैवत—इन दोनोंकी एकता ही है ।<br><br>और तुमने जो रूपादिके अतिदेशको उनके भेदका कारण बतलाया, सो वह उनका भेद सूचित करनेके लिये नहीं है। तो वह किसलिये है? वह तो, आश्रयका भेद होनेसे कहीं उनके भेदकी आशङ्का न हो जाय—इसलिये है॥ ५ ॥ |


१. अन्यके धर्मोंको अन्यमें लगाना ।

खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३


स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति। तय इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ ६ ॥

वह यह ( चाक्षुष पुरुष ) जो इस ( अध्यात्म आत्मा ) से नीचेके लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है । अतः जो ये लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं इसीसे वे धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥

स एष चाक्षुषः पुरुषो ये चैतस्मादाध्यात्मिकादात्मनोऽर्वाञ्चोऽर्वाग्गता लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यसंबन्धिनां च कामानाम्। तत्तस्माद्य इमे वीणायां गायन्ति गायकास्त एतमेव गायन्ति । यस्मादीश्वरं गायन्ति तस्मात्ते धनसनयो धनलाभयुक्ता धनवन्त इत्यर्थः ॥ ६ ॥वह यह चाक्षुष पुरुष जो इस आध्यात्मिक आत्मासे नीचेके लोक हैं, उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी कामनाओंका ईशन (शासन) करता है । अतः जो ये गायक लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं । इस प्रकार क्योंकि वे ईश्वरका ही गान करते हैं, इसलिये वे धनलाभयुक्त अर्थात् धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥

इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फल

अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताँश्चाप्नोति देवकामाँश्च ॥ ७ ॥

तथा जो इस प्रकार [ चाक्षुष और आदित्य दोनों पुरुषोंकी एकता ] जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह [ चाक्षुष और आदित्य ]