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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
| ९५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| ९५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पासनैस्तद्वाचकेन ग्रन्थेनाष्टाध्यायीलक्षणेन सह ब्रह्मा हिरण्यगर्भः परमेश्वरो वा तद्द्वारेण प्रजापतये कश्यपायोवाच, असावपि मनवे स्वपुत्राय, मनुः प्रजाभ्यः, इत्येवं श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरम्परागतमुपनिषद्विज्ञानमद्यापि विद्वत्स्ववगम्यते। | वर्णन करनेवाले इस आठ अध्यायवाले ग्रन्थके साथ ब्रह्मा-हिरण्यगर्भ अथवा परमेश्वरने प्रजापति—कश्यपके प्रति वर्णन किया था। उन्होंने अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने प्रजावर्गको सुनाया। इस प्रकार श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरम्परासे आया हुआ वह विज्ञान आज भी विद्वानोंमें देखा जाता है। |
| यथेह षष्ठाद्यध्यायत्रये प्रकाशितात्मविद्या सफलावगम्यते तथा कर्मणां न कश्चनार्थ इति प्राप्ते तदानर्थक्यप्राप्तिपरिजिहीर्षयेदं कर्मणो विद्वद्भिरनुष्ठीयमानस्य विशिष्टफलवत्त्वेनार्थवत्त्वमुच्यते— | जिस प्रकार छठे आदि इन तीन अध्यायोंमें वर्णन की हुई आत्मविद्या सफल समझी जाती है उस प्रकार कर्मोंका कोई प्रयोजन नहीं है—यह बात प्राप्त होनेपर कर्मोंकी व्यर्थता प्राप्त होती है; अतः उसकी निवृत्तिकी इच्छासे विद्वानोंद्वारा अनुष्ठित होनेवाले कर्मोंके विशिष्टफलयुक्त होनेसे उनकी सार्थकताका निरूपण किया जाता है— |
| आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य सहार्थतोऽध्ययनं कृत्वा यथाविधानं यथास्मृत्युक्तैर्नियमैर्युक्तः सन्नित्यर्थः। सर्वस्यापि विधेः स्मृत्युक्तस्योपकुर्वाणं प्रति कर्त- | आचार्यकुलसे वेदाध्ययन कर अर्थात् यथाविधान—जैसे कि स्मृतियोंने नियम बतलाये हैं उनसे युक्त हो अर्थके सहित वेदका स्वाध्याय कर—क्योंकि उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके लिये स्मृत्युक्त सम्पूर्ण विधि कर्तव्य है, अतः उसमें |
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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| न्यत्वे गुरुशुश्रूषायाः प्राधान्यप्रदर्शनार्थमाह—गुरोः कर्म यत्कर्त्तव्यं तत्कृत्वा कर्मशून्यो योऽतिशिष्टः कालस्तेन कालेन वेदमधीत्येत्यर्थः । एवं हि नियमवताधीतो वेदः कर्मज्ञानफलप्राप्तये भवति नान्यथेत्यभिप्रायः ।<br><br>अभिसमावृत्य धर्मजिज्ञासां समापयित्वा गुरुकुलान्निवृत्य न्यायतो दारानहृत्य कुटुम्बे स्थित्वा गार्हस्थ्ये विहिते कर्मणि तिष्ठन्नित्यर्थः । तत्रापि गार्हस्थ्यविहितानां कर्मणां स्वाध्यायस्य प्राधान्यप्रदर्शनार्थमुच्यते—शुचौ विविक्तेऽमेध्यादिरहिते देशे यथावदासीनः स्वाध्यायमधीयानो नैत्यकमधिकं च यथाशक्ति ऋगाद्यभ्यासं च कुर्वन्द्धार्मिकान्पुत्राञ्छिष्यांश्च धर्मयुक्तान्विदधद्धार्मिकत्वेन तान्नियमयन्नात्मनि | गुरुशुश्रूषाकी प्रधानता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति कहती है—गुरुका जो करनेयोग्य कर्म हो उसे करके जो कर्मशून्य समय शेष रहे उस समयमें वेदका अध्ययन कर—ऐसा इसका तात्पर्य है। अतः अभिप्राय यह है कि इस प्रकार नियमवान् विद्यार्थीका अध्ययन किया हुआ वेद ही कर्म और ज्ञानकी फलप्राप्तिका हेतु होता है और किसी प्रकार नहीं।<br><br>'अभिसमावृत्य' अर्थात् धर्मजिज्ञासाको समाप्त कर गुरुकुलसे निवृत्त हो नियमपूर्वक स्त्रीपरिग्रह कर कुटुम्बमें स्थित हो अर्थात् गृहस्थाश्रममें विहित कर्ममें तत्पर हो; वहाँ भी गृहस्थाश्रमके लिये विहित कर्मोंमें स्वाध्यायकी प्रधानता प्रदर्शित करनेके लिये ऐसा कहा जाता है—शुचि—विविक्त अर्थात् अपवित्र पदार्थोंसे रहित स्थानमें यथावत् बैठकर स्वाध्याय करता हुआ अर्थात् प्रतिदिनका नियमित पाठ और यथाशक्ति उससे अधिक भी ऋगादिका अभ्यास करता हुआ पुत्र एवं शिष्योंको धार्मिक—धर्मवान् बनाता हुआ अर्थात् धार्मिकत्वद्वारा उनका नियमन करता हुआ 'आत्मनि'—अपने |