छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
९४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वहृदये हार्दे ब्रह्मणि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्योपसंहृत्येन्द्रियग्रहणात्कर्माणि च संन्यस्याहिंसन् हिंसां परपीड़ामकुर्वन् सर्वभूतानि स्थावरजङ्गमानि भूतान्यपीडयन्नित्यर्थः । | हृदयमें यानी हृदयस्थ ब्रह्ममें सम्पूर्ण इन्द्रियोंको स्थापित—उपसंहृत कर और इन्द्रियनिग्रहद्वारा कर्मोंका संन्यास कर ‘अहिंसन्’—हिंसा अर्थात् परपीड़ा न करता हुआ यानी स्थावर-जंगम समस्त प्राणियोंको पीडित न करता हुआ । |
| भिक्षानिमित्तमटनादिनापि परपीड़ा स्यादित्यत आह— | भिक्षाके लिये किये हुए भ्रमणादिसे भी परपीड़ा ( हिंसा ) हो सकती है, इसलिये श्रुति कहती है—‘अन्यत्र तीर्थेभ्यः’ । |
| अन्यत्र तीर्थेभ्यः । तीर्थं नाम शास्त्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः। | जो शास्त्राज्ञाका विषय है उसे ‘तीर्थ’ कहते हैं, अतः तात्पर्य यह है कि उसके सिवा अन्यत्र हिंसा न करता हुआ । |
| सर्वाश्रमिणां चैतत् समानम् । तीर्थेभ्योऽन्यत्राहिंसैवेत्यन्ये वर्णयन्ति । कुटुम्ब एवैतत्सर्वं कुर्वन्स खल्वधिकृतो यावदायुषं यावज्जीवमेवं यथोक्तेन प्रकारेणैव वर्तयन् ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते देहान्ते । न च पुनरावर्तते शरीर- | यह नियम सभी आश्रमोंके लिये समान है । कुछ अन्य विद्वान् लोग तो ऐसा कहते हैं कि तीर्थोंके सिवा और सब जगह अहिंसाका ही विधान है । अपने कुटुम्बमें ही यह सब करता हुआ वह अधिकारी पुरुष आयुपर्यन्त अर्थात् यावज्जीवन उपर्युक्त प्रकारसे ही बर्तता हुआ देहान्त होनेपर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और फिर शरीर ग्रहण करनेके लिये नहीं लौटता; क्योंकि |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५७
| ग्रहणाय; पुनरावृत्तेः प्राप्तायाः प्रतिषेधात् । अर्चिरादिना मार्गेण कार्यब्रह्मलोकमभिसम्पद्य यावद्ब्रह्मलोकस्थितिस्तावत्तत्रैव तिष्ठति प्राक्ततो नावर्तत इत्यर्थः । द्विरभ्यास उपनिषद्विद्यापरिसमाप्त्यर्थः ॥ १ ॥ | पुनरावृत्तिकी प्राप्तिका प्रतिषेध किया गया है । तात्पर्य यह है कि अर्चिरादि मार्गसे कार्यब्रह्मके लोकको प्राप्त हो जबतक ब्रह्मलोककी स्थिति रहती है तबतक वह वहीं रहता है, उसका नाश होनेसे पूर्व वह वहाँसे नहीं लौटता ।☸ 'न च पुनरावर्तते, न च पुनरावर्तते' यह द्विरुक्ति उपनिषद्विद्याकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चदश-खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये ऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ छान्दोग्योपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥
☸ यहाँ यह शंका होती है कि क्या ब्रह्मलोकके नाश होनेके बाद वह लौटता है ? तो इसका उत्तर है नहीं, वह ब्रह्ममें विलीन हो जाता है, क्योंकि ब्रह्मलोकके नाश होनेके बाद तो कोई लोक ही नहीं रह जाता है।
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❦ ꕥ ❦
</div>श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अग्निहिंङ्कारो वायुः | २ | २० | १ | २०२ |
| अग्निष्टे पादं वक्तेति | ४ | ६ | १ | ३८९ |
| अजा हिङ्कारोऽवयः | २ | १८ | १ | १९९ |
| अतो यान्यन्यानि | १ | ३ | ५ | ६९ |
| अत्र यजमानः परस्तादायुषः | २ | २४ | ६ | २३७ |
| ,, ,, | २ | २४ | १० | २३९ |
| अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् | ५ | १२ | २ | ५४७ |
| ,, ,, | ५ | १४ | २ | ५५२ |
| ,, ,, | ५ | १५ | २ | ५५३ |
| ,, ,, | ५ | १६ | २ | ५५५ |
| ,, ,, | ५ | १७ | २ | ५५७ |
| अथ खलु य उद्गीथः | १ | ५ | १ | ८३ |
| ,, ,, | १ | ५ | ५ | ८७ |
| अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम् | १ | ३ | ३ | ६७ |
| अथ खलूद्गीथाक्षराणि | १ | ३ | ६ | ७० |
| अथ खल्वमुमादित्यम् | २ | ९ | १ | १७३ |
| अथ खल्वात्मसंमितमति० | २ | १० | १ | १८१ |
| अथ खल्वाशीः | १ | ३ | ८ | ७३ |
| अथ खल्वेतयर्चा पच्छः | ५ | २ | ७ | ४९८ |
| अथ जुहोति नमः | २ | २४ | १४ | २४० |
| अथ जुहोति नमो वायवे | २ | २४ | ९ | २३८ |
| अथ जुहोति नमोऽग्नये | २ | २४ | ५ | २३६ |
| अथ तत ऊर्ध्वः | ३ | ११ | १ | २७२ |
| अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ | ५ | २ | ६ | ४६७ |
| अथ य आत्मा स सेतुः | ८ | ४ | १ | ८३६ |
| अथ य इमे ग्रामे | ५ | १० | ३ | ५०९ |
( ९५० )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथ य एतदेवम् | ५ | २४ | २ | ५७० |
| अथ य एतदेवं विद्वान् | १ | ७ | ७ | १०३ |
| अथ य एष सम्प्रसादः | ८ | ३ | ४ | ८३१ |
| अथ य एषोऽन्तराक्षिणि | १ | ७ | ५ | १०० |
| अथ यच्चतुर्थममृतम् | ३ | ९ | १ | २६८ |
| अथ यत्तदजायत | ३ | १९ | ३ | ३४८ |
| अथ यत्तपो दानम् | ३ | १७ | ४ | ३३१ |
| अथ यत्तृतीयममृतम् | ३ | ८ | १ | २६४ |
| अथ यत्पञ्चमममृतम् | ३ | १० | १ | २७० |
| अथ यत्प्रथमास्तमिते | २ | ९ | ८ | १७९ |
| अथ यत्प्रथमोदिते | २ | ९ | ३ | १७५ |
| अथ यत्रैतत्पुरुषः | ६ | ८ | ५ | ६५४ |
| अथ यत्रैतदबलिमानम् | ८ | ६ | ४ | ८६० |
| अथ यत्रैतदस्माच्छरीराद् | ८ | ६ | ५ | ८६१ |
| अथ यत्रैतदाकाशम् | ८ | १२ | ४ | ९३१ |
| अथ यत्रोपाकृते | ४ | १६ | ४ | ४३२ |
| अथ यत्सङ्गववेलायाम् | २ | ९ | ४ | १७६ |
| अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने | २ | ९ | ५ | १७७ |
| अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते | ८ | ५ | २ | ८४३ |
| अथ यदतः परो दिवः | ३ | १३ | ७ | २९८ |
| अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते | ८ | ५ | ३ | ८४४ |
| अथ यदवोचं भुवः | ३ | १५ | ६ | ३२१ |
| अथ यदवोचं भूः | ३ | १५ | ५ | ३२० |
| अथ यदवोचं स्वः | ३ | १५ | ७ | ३२१ |
| अथ यदश्नाति | ३ | १७ | २ | ३३० |
| अथ यदास्य वाङ्मनसि | ६ | १५ | २ | ६९५ |
| अथ यदि गन्धमाल्यलोककामः | ८ | २ | ६ | ८२३ |
| अथ यदि गीतवादित्रलोककामः | ८ | २ | ८ | ८२३ |
| अथ यदि तस्याकर्ता | ६ | १६ | २ | ७०० |
| अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे | ८ | १ | १ | ८०५ |
| अथ यदि भ्रातृलोककामः | ८ | २ | ३ | ८२२ |
| अथ यदि महज्जिगमिषेद् | ५ | २ | ४ | ४६४ |
( ९५१ )
| मंत्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठं | |
|---|---|---|---|---|---|
| अथ यदि मातृलोककामः | .... | ८ | २ | २ | ८२२ |
| अथ यदि यजुष्टो रिष्येत् | .... | ४ | १७ | ५ | ४३६ |
| अथ यदि सखिलोककामः | .... | ८ | २ | ५ | ८२३ |
| अथ यदि सामतो रिष्येत् | .... | ४ | १७ | ६ | ४३७ |
| अथ यदि स्त्रीलोककामः | .... | ८ | २ | ९ | ८२४ |
| अथ यदि स्वसृलोककामः | ... | ८ | २ | ४ | ८२२ |
| अथ यदु चैवाहिश्चोल्ब्यम् | ... | ४ | १५ | ५ | ४२३ |
| अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् | ... | २ | ९ | ६ | १७८ |
| अथ यदूर्ध्वमपराह्नात् | ... | २ | ९ | ७ | १७९ |
| अथ यदेतदक्षणः शुक्लम् | ... | १ | ७ | ४ | ९९ |
| अथ यदेतदादित्यस्य | ... | १ | ६ | ५ | ९२ |
| अथ यदेवैतदादित्यस्य | .... | १ | ६ | ६ | ९३ |
| अथ यद्द्वितीयममृतम् | .... | ३ | ७ | १ | २६२ |
| अथ यद्धसति | ... | ३ | १७ | ३ | ३३१ |
| अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते | .... | ८ | ५ | १ | ८४२ |
| अथ यद्यन्नपानलोककामः | .... | ८ | २ | ७ | ८२३ |
| अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्त० | .... | ७ | १५ | ३ | ७७१ |
| अथ यद्येनमूष्मसूपाल्भेत | ... | २ | २२ | ४ | २१२ |
| अथ या एता हृदयस्य | .... | ८ | ६ | १ | ८५४ |
| अथ यां चतुर्थीम् | ... | ५ | २२ | १ | ५६७ |
| अथ यां तृतीयाम् | .... | ५ | २१ | १ | ५६६ |
| अथ यां द्वितीयाम् | .... | ५ | २० | १ | ५६५ |
| अथ यां पञ्चमीम् | .... | ५ | २३ | १ | ५६८ |
| अथ यानि चतुश्चत्वारिँशत् | ... | ३ | १६ | ३ | ३२६ |
| अथ यान्यष्टाचत्वारिँशत् | ... | ३ | १६ | ५ | ३२७ |
| अथ ये चास्येह | .... | ८ | ३ | २ | ८२७ |
| अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयः | ... | ३ | २ | १ | २४९ |
| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चः | ... | ३ | ३ | १ | २५१ |
| अथ येऽस्योदञ्चः | .... | ३ | ४ | १ | २५२ |
| अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयः | .... | ३ | ५ | १ | २५५ |
| अथ यो वेदेदं मन्वानीति | .... | ८ | १२ | ५ | ९३३ |
| अथ योऽस्य दक्षिणः | .... | ३ | १३ | २ | २९१ |
( १५२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|---|---|
| अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः | ... | ३ | १३ | ३ | २९३ |
| अथ योऽस्योदङ् सुषिः | ... | ३ | १३ | ४ | २९४ |
| अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः | .... | ३ | १३ | ५ | २९५ |
| अथ सप्तविधस्य वाचि | ... | २ | ८ | १ | १७० |
| अथ ह हँसा निशायाम् | .... | ४ | १ | २ | ३५४ |
| अथ ह चक्षुरुद्गीथम् | .... | १ | २ | ४ | ५२ |
| अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन् | .... | ५ | १ | १२ | ४५१ |
| अथ ह प्राणा अहँश्रेयसि | .... | ५ | १ | ६ | ४४६ |
| अथ ह मन उद्गीथम् | .... | १ | २ | ६ | ५३ |
| अथ ह य एतानेवम् | ... | ५ | १० | १० | ५३५ |
| अथ ह य एवायं मुख्यः | .... | १ | २ | ७ | ५४ |
| अथ ह वाचमुद्गीथम् | .... | १ | २ | ३ | ५२ |
| अथ ह शौनकं च | ... | ४ | ३ | ५ | ३७२ |
| अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम् | .... | १ | २ | ५ | ५३ |
| अथ हाग्नयः समूदिरे | ... | ४ | १० | ४ | ४०३ |
| अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव | .... | ८ | ९ | १ | ८८७ |
| अथ हैनँ गार्हपत्यः | .... | ४ | ११ | १ | ४०९ |
| अथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद | .... | १ | ११ | ८ | १३६ |
| अथ हैनँ प्रस्तोतोपससाद | .... | १ | ११ | ४ | १३३ |
| अथ हैनँ यजमान उवाच | .... | १ | ११ | १ | १३१ |
| अथ हैनँ वागुवाच | ... | ५ | १ | १३ | ४५२ |
| अथ हैनँ श्रोत्रमुवाच | ... | ५ | १ | १४ | ४५२ |
| अथ हैनमन्वाहार्यपचनः | .... | ४ | १२ | १ | ४१२ |
| अथ हैनमाहवनीयः | ... | ४ | १३ | १ | ४१४ |
| अथ हैनमुद्गातोपससाद | .... | १ | ११ | ६ | १३५ |
| अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद | ... | ४ | ५ | १ | ३८६ |
| अथ होवाच जनशाँर्कराक्ष्य | .... | ५ | १५ | १ | ५५३ |
| अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विम् | .... | ५ | १६ | १ | ५५५ |
| अथ होवाच सत्ययज्ञम् | ... | ५ | १३ | १ | ५४९ |
| अथ होवाचेन्द्रद्युम्नम् | ... | ५ | १४ | १ | ५५१ |
| अथ होवाचोद्दालकम् | ... | ५ | १७ | १ | ५५७ |
| अथात आत्मादेश एव | .... | ७ | २५ | २ | ७९४ |
( ९५३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|---|---|
| अथातः शौव उद्गीथः | ... | १ | १२ | १ | १३८ |
| अथाधिदैवतं य एवासौ | ... | १ | ३ | १ | ६४ |
| अथाध्यात्मं प्राणो वाव | .... | ४ | ३ | ३ | ३७१ |
| अथाध्यात्मं य एवायम् | .... | १ | ५ | ३ | ८५ |
| अथाध्यात्मं वागेवक्प्राणः | .... | १ | ७ | १ | ९८ |
| अथानु किमनुशिष्टः | .... | ५ | ३ | ४ | ४७५ |
| अथानेनैव ये चैतस्मात् | .... | १ | ७ | ८ | १०४ |
| अथावृत्तेषु यौर्हिङ्कारः | ... | २ | २ | २ | १५७ |
| अथैतयोः पथोर्न कतरेण | .... | ५ | १० | ८ | ५३१ |
| अथोताप्याहुः | .... | २ | १ | ३ | १५२ |
| अधीहि भगव इति | .... | ७ | १ | १ | ७१२ |
| अनिरुक्तस्त्रयोदशः | ... | १ | १३ | ३ | १४७ |
| अन्तरिक्षमेवग्वायुः | .... | १ | ६ | २ | ९१ |
| अन्तरिक्षोदरः कोशः | .... | ३ | १५ | १ | ३१७ |
| अन्नं वाव बलाद्भूयः | .... | ७ | ९ | १ | ७४९ |
| अन्नमयँ॒ हि सोम्य | ... | ६ | ५ | ४ | ६२६ |
| ,, ,, | ... | ६ | ६ | ५ | ६३१ |
| अन्नमशितं त्रेधा विधीयते | .... | ६ | ५ | १ | ६२३ |
| अन्नमिति होवाच | .... | १ | ११ | ९ | १३६ |
| अन्यतरामेव वर्तनीम् | .... | ४ | १६ | ३ | ४३० |
| अपां का गतिरित्यसौ | .... | १ | ८ | ५ | १११ |
| अपाँ॒ सोम्य पीयमानानाम् | .... | ६ | ६ | ३ | ६३० |
| अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति | .... | ५ | २१ | २ | ५६६ |
| अभिमन्थति स हिङ्कारः | ... | २ | १२ | १ | १८९ |
| अभ्रं भूत्वा मेघो भवति | ... | ५ | १० | ६ | ५२१ |
| अभ्राणि संप्लवन्ते | .... | २ | १५ | १ | १९४ |
| अमृतत्वं देवेभ्यः | .... | २ | २२ | २ | २१० |
| अयं वाव लोकः | .... | १ | १३ | १ | १४४ |
| अयं वाव स योऽयमन्तः | .... | ३ | १२ | ८ | २८५ |
| अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदये | .... | ३ | १२ | ९ | २८५ |
| अरिष्टं कोशम् | .... | ३ | १५ | ३ | ३२० |
| अशनापिपासे मे सोम्य | .... | ६ | ८ | ३ | ६४८ |
( ९५४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् | ८ | १२ | २ | ९२२ |
| असौ वा आदित्यः | ३ | १ | १ | २४३ |
| असौ वाव लोकः | ५ | ४ | १ | ४८३ |
| अस्य यदेकाँ शाखां | ६ | ११ | २ | ६७२ |
| अस्य लोकस्य का गतिः | १ | ९ | १ | ११७ |
| अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य | ६ | ११ | १ | ६७१ |
| आकाशो वाव तेजसः | ७ | १२ | १ | ७५८ |
| आकाशो वै नाम | ८ | १४ | १ | ९३९ |
| आगाता ह वै कामानाम् | १ | २ | १४ | ६३ |
| आत्मानमन्तत उपसृत्य | १ | ३ | १२ | ७६ |
| आदिप्रत्नस्य रेतसः | ३ | १७ | ७ | ३३५ |
| आदित्य इति होवाच | १ | ११ | ७ | १३५ |
| आदित्य ऊकारः | १ | १३ | २ | १४५ |
| आदित्यमथ वैश्वदेवम् | २ | २४ | १३ | २४० |
| आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः | ३ | १९ | १ | ३४४ |
| आदिरिति द्व्यक्षरम् | २ | १० | २ | १८३ |
| आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते | ६ | ५ | २ | ६२४ |
| आपयिता ह वै कामानाम् | १ | १ | ७ | ४० |
| आपो वावान्नाद्भूयस्यः | ७ | १० | १ | ७५२ |
| आप्नोति हादित्यस्य | २ | १० | ६ | १८६ |
| आशा वाव स्मराद्भूयसी | ७ | १४ | १ | ७६४ |
| इति तु पञ्चमायामाहुतावापः | ५ | ९ | १ | ४९६ |
| इदं वाव तज्ज्येष्ठाय | ३ | ११ | ५ | २७६ |
| इदमिति ह प्रतिजज्ञे | ४ | १४ | ३ | ४१७ |
| इमाः सोम्य नद्यः | ६ | १० | १ | ६६८ |
| इयमेवर्गग्निः | १ | ६ | १ | ८९ |
| उदशराव आत्मानमवेक्ष्य | ८ | ८ | १ | ८७६ |
| उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति | ५ | २३ | २ | ५६८ |
| उद्गीथ इति त्र्यक्षरम् | २ | १० | ३ | १८३ |
| उद्गच्छति तन्निधनम् | २ | ३ | २ | १६० |
| उद्दालको हारुणिः | ६ | ८ | १ | ६४१ |
| उच्चन्निङ्कार उदितः | २ | १४ | १ | १९२ |
( ५५५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| उपकोसलो ह वै | ४ | १० | १ | ४०० |
| उपमन्त्रयते स हिङ्कारः | २ | १३ | १ | १९१ |
| ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि | ७ | १ | २ | ७१३ |
| ऋतुषु पञ्चविधम् | २ | ५ | १ | १६३ |
| एकविँशत्यादित्यम् | २ | १० | ५ | १८५ |
| एतँ संयद्वाम इत्याचक्षते | ४ | १५ | २ | ४२२ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वाँसः | ६ | ४ | ५ | ६१९ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह | ३ | १६ | ७ | ३२८ |
| एतमु एवाहमभ्यगासिषम् | १ | ५ | २ | ८४ |
| ,, ,, | १ | ५ | ४ | ८६ |
| एतमृग्वेद मभ्यतपँस्तस्याभि० | ३ | १ | ३ | २४४ |
| एतेषां मे देहीति | १ | १० | ३ | १२४ |
| एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा | १ | २ | ८ | ५६ |
| एवँ सोम्य ते षोडशानाम् | ६ | ७ | ६ | ६३७ |
| एवमेव खलु सोम्य | ६ | ६ | २ | ६२९ |
| ,, ,, | ६ | ११ | ३ | ६७४ |
| एवमेव खलु सोम्येमाः | ६ | १० | २ | ६६९ |
| एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच | १ | १० | ११ | १३० |
| एवमैवैष मघवन्निति | ८ | ९ | ३ | ८९२ |
| ,, ,, | ८ | ११ | ३ | ९०३ |
| एवमैवैष सम्प्रसादः | ८ | १२ | ३ | ९२४ |
| एवमेवोद्गातारमुवाच | १ | १० | १० | १३० |
| एवमेषां लोकानामासाम् | ४ | १७ | ८ | ४३८ |
| एष उ एव भामनीरेष हि | ४ | १५ | ४ | ४२३ |
| एष उ एव वामनीरेष हि | ४ | १५ | ३ | ४२२ |
| एष तु वा अतिवदति | ७ | १६ | १ | ७७४ |
| एष म आत्मान्तर्हृदये | ३ | १४ | ३ | ३११ |
| एष वै यजमानस्य | २ | २४ | १५ | २४० |
| एष ह वा उदक्प्रवणः | ४ | १७ | ९ | ४३९ |
| एष ह वै यज्ञो योऽयम् | ४ | १६ | १ | ४२८ |
| एषां भूतानां पृथिवी रसः | १ | १ | २ | ३३ |
| ओ ३ मदा ३ मो ३ पिबा० | १ | १२ | ५ | १४२ |
( ९५६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत | १ | ४ | १ | १७७ |
| ,, ,, | १ | १ | १ | ३१ |
| औपमन्यव कं त्वम् | ५ | १२ | १ | ५४५ |
| कं ते काममागायानीत्येषः | १ | ७ | ९ | १५४ |
| कतमा कतमर्क्कतमत् | १ | १ | ४ | ३५ |
| कल्पन्ते हास्मा ऋतवः | २ | ५ | २ | १६४ |
| कल्पन्ते हास्मै | २ | २ | ३ | १५८ |
| का साम्नो गतिरिति | १ | ८ | ४ | १०९ |
| कुतस्तु खलु | ६ | २ | २ | ५८८ |
| क्व तर्हि यजमानस्य | २ | २४ | २ | २३४ |
| गायत्री वा इदँ सर्वम् | ३ | १२ | १ | २७९ |
| गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते | ७ | २४ | २ | ७९१ |
| चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ५ | ३४२ |
| चक्षुरेवर्गात्मा | १ | ७ | २ | ९८ |
| चक्षुर्होवाचकाम | ५ | १ | ९ | ४४९ |
| चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भूयः | ७ | ५ | १ | ७३४ |
| जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः | ४ | १ | १ | ३५२ |
| तं चेदेतस्मिन्वयसि | ३ | १६ | २ | ३२५ |
| ,, ,, | ३ | १६ | ४ | ३२६ |
| ,, ,, | ३ | १६ | ६ | ३२७ |
| तं चेद्ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदम् | ८ | १ | ४ | ८११ |
| त चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् | ८ | १ | २ | ८०७ |
| तं जायोवाच ततः | ४ | १० | २ | ४०१ |
| तं जायोवाच हन्त | १ | १० | ७ | १२७ |
| तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद | ४ | ८ | २ | ३९४ |
| तँ हँ स उपनिपत्याभ्युवाद | ४ | ७ | २ | ३९२ |
| तँ ह चिरं वसेत्याशा० | ५ | ३ | ७ | ४७९ |
| तँ ह प्रवाहणः | १ | ८ | ८ | ११५ |
| तँ ह शिलकः | १ | ८ | ६ | ११२ |
| तँ हाङ्गिरा उद्गीथम् | १ | २ | १० | ५९ |
| तँ हाभ्युवाद रैक्वेदम | ४ | २ | ४ | ३६६ |
| तँ हैतमतिधन्वा | १ | ९ | ३ | ११९ |