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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

८४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


तथा जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्—परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त करता है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको जानकर पुरुष मनन करता है ॥२॥

| अथ यत्सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्; तथा सतः परमादात्मन आत्मनस्त्राणं रक्षणं ब्रह्मचर्यसाधनेन विन्दते । अतः सत्रायणशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव तत् । अथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्, ब्रह्मचर्येणैव साधनेन युक्तः सन्नात्मानं शास्त्राचार्याभ्यामनुविद्य पश्चान्मन्ुते ध्यायति । अतो मौनशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव ॥ २ ॥ | तथा जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि पूर्वोक्त (यज्ञ और इष्ट) के समान ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ही पुरुष सत्—परमात्मासे अपनी रक्षा कराता है। अतः सत्रायण नामवाला भी ब्रह्मचर्य ही है। और जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यरूप साधनसे युक्त हुआ ही साधक शास्त्र और आचार्यसे आत्माको जानकर फिर मनन अर्थात् ध्यान करता है। अतः 'मौन' नामवाला भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ २ ॥ |

अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दतेऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरंमदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितँ हिरण्मयम् ॥ ३ ॥

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४५


तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरणयायन ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है; क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरंमदीय सरोवर है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय मण्डप है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। यमात्मानं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते स एष ह्यात्मा ब्रह्मचर्यसाधनवतो न नश्यति तस्मादनाशकायनमपि ब्रह्मचर्यमेव।तथा जिसे 'अनाशकायन' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। जिस आत्माको ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त करता है, ब्रह्मचर्यरूप साधनवाले पुरुषका वह आत्मा नष्ट नहीं होता; अतः अनाशकायन भी ब्रह्मचर्य ही है।
अथ यदरणयायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। अरण्यशब्दयोरर्णवयोर्ब्रह्मचर्यवतोऽयनादरणयायनं ब्रह्मचर्यम्। यो ज्ञानाद्यज्ञ एषणादिष्टं सतस्त्राणात्सत्रायणं मननान्मौनमनशनादनाशकायनमरण्योर्गमनादरणयाय-और जिसे 'अरणयायन' (वनवास) ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्यवान् पुरुष 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्रोंके प्रति गमन करता है, इसलिये ब्रह्मचर्य अरणयायन है। जो ब्रह्मचर्य ज्ञानरूप होनेके कारण यज्ञ है, एषणाके कारण इष्ट है, सत् (ब्रह्म) से रक्षा करानेके कारण सत्रायण है, मनन करनेके कारण मौन है, नष्ट न होनेके कारण अनाशकायन है और अर एवं ण्य इन