छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| विशेषोऽस्ति । कथम् ? यानि प्रवृत्तफलानि कर्माणि यैर्विद्वच्छरीरमारब्धम्, तेषामुपभोगेनैव क्षयः । यथारब्धवेगस्य लक्ष्यमुक्तेष्वादेर्वेगक्षयादेव स्थितिर्न तु लक्ष्यवेधसमकालमेव प्रयोजनं नास्तीति तद्वत् । अन्यानि त्वप्रवृत्तफलानीह प्राग्ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च कृतानि वा क्रियमाणानि वातीतजन्मान्तरकृतानि वाप्रवृत्तफलानि ज्ञानेन दह्यन्ते प्रायश्चित्तेनेव । "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" (गीता ४।३७) इति स्मृतेश्च । "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" इति चाथर्वणे ।<br><br>अतो ब्रह्मविदो जीवनादिप्रयोजनाभावेऽपि प्रवृत्तफलानां | फलकर्मोंमें कुछ विशेषता है । किस प्रकार ?—जो प्रवृत्तफलकर्म हैं; जिनसे कि विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है उनका क्षय फलोपभोगके द्वारा ही हो सकता है; जिस प्रकार जिसका वेग आरम्भ हो गया है उस लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी स्थिति उसके वेगका क्षय होनेपर ही हो सकती है, लक्ष्यवेध करते ही उसे [ आगे जानेका ] कोई प्रयोजन नहीं रहता—ऐसी बात नहीं है; उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये । ज्ञानीके जो अन्य अप्रवृत्तफलकर्म ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व किये हुए अथवा उसके पश्चात् किये जानेवाले होते हैं अथवा जो पूर्व जन्मोंमें किये हुए अप्रवृत्तफलकर्म होते हैं वे प्रायश्चित्तसे पापोंके समान ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं । "तथा ज्ञानाग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्मीभूत कर देता है" इस स्मृतिसे यही प्रमाणित होता है, और "इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं" ऐसा अथर्वण-श्रुतिमें भी कहा है ।<br><br>अतः ब्रह्मवेत्ताको जीवनादिका प्रयोजन न होनेपर भी प्रवृत्तफल- |
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९३
| कर्मणामवश्यमेव फलोपभोगः स्यादिति मुक्तेषुवत् 'तस्य तावदेव चिरम्' इति युक्तमेवोक्तमिति यथोक्तदोषचोदनानुपपत्तिः । ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च ब्रह्मविदः कर्माभावमवोचाम 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यत्र तच्च स्मर्तुमर्हसि ॥ २ ॥ | कर्मोंका फलोपभोग अवश्य होना है इसलिये छोड़े हुए बाणके समान 'उसे [ सत्की प्राप्तिमें ] तभीतक विलम्ब है जबतक कि वह देहबन्धनसे नहीं छूटता' ऐसा ठीक ही कहा है, अतः उपर्युक्त दोषकी शङ्का करना ठीक नहीं। 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस वाक्यकी व्याख्याके समय ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् तो हमने ब्रह्मवेत्ताके कर्मका अभाव प्रतिपादन किया है, उसे इस समय स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥ |
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| स य इत्याद्युक्तार्थम् । आचार्यवान्विद्वान्येन क्रमेण सत्सम्पद्यते तं क्रमं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'हे भगवन् ! आचार्यवान् विद्वान् जिस क्रमसे सत्को प्राप्त होता है वह क्रम मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। तब आरुणिने कहा 'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड
मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
पुरुषᳪसोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! [ ज्वरादिसे ] संतप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं—'क्या तू मुझे जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ?' जबतक उसकी वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान लेता है ॥ १ ॥
| पुरुषं हे सोम्योतोपतापिनं ज्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बान्धवाः परिवार्योपासते मुमूर्षुम्— जानासि मां तव पितरं पुत्रं भ्रातरं वा—इति पृच्छन्तः। तस्य मुमूर्षोर्यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामित्येतदुक्तार्थम् ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! उपतापी—ज्वरादिसे अत्यन्त संतप्त हुए पुरुषको ज्ञातिजन-बान्धवगण घेरकर उस मुमूर्षु पुरुषसे 'क्या तू मुझ अपने पिता, पुत्र अथवा भाईको पहचानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उसके चारों ओर बैठ जाते हैं । उस मुमूर्षु की जबतक वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ १ ॥ |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
| संसारिणो यो मरणक्रमः स एवायं विदुषोऽपि सत्सम्पत्तिक्रम इत्येतदाह-- | संसारी जीवका जो मरणक्रम है वही विद्वान्की सत्सम्पत्तिका क्रम है--इसी बातको आरुणि बतलाता है-- |
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अथ यदास्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥
फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता ॥ २ ॥
| परस्यां देवतायां तेजसि सम्पन्नेऽथ न जानाति ।<br><br>सत्सम्पत्तिक्रमः<br>अविद्वांस्तु सत उत्थाय प्राग्भावितं व्याघ्रादिभावं देवमनुष्यादिभावं वा विशति । विद्वांस्तु शास्त्राचार्योपदेशजनितज्ञानदीपप्रकाशितं सद्ब्रह्मात्मानं प्रविश्य नावर्तत इत्येष सत्सम्पत्तिक्रमः ।<br><br>अन्ये तु मूर्धन्यया नाड्योत्क्रम्यादित्यादि-<br>मतान्तरनिरासः<br>द्वारेण सद्गच्छन्तीत्याहुः, तदसत्; देशकाल- | परदेवतामें तेजके लीन हो जानेपर फिर यह नहीं पहचानता। किंतु जो अविद्वान् होता है वह तो सत्से उत्थित होकर पहले भावना किये हुए व्याघ्रादि भाव और देव-मनुष्यादि भावमें प्रवेश करता है; किंतु विद्वान् शास्त्र और आचार्यके उपदेशजनित ज्ञानदीपकसे प्रकाशित सद्ब्रह्मरूप आत्मामें प्रवेशकर फिर नहीं लौटता—यही सत्प्राप्तिका क्रम है।<br><br>कुछ अन्य मतावलम्बियोंने जो कहा है कि मूर्धन्य नाडीसे उत्क्रमण कर आदित्यादिद्वारा सत्को प्राप्त होता है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकारका गमन तो देश, काल, निमित्त और फलके अभिनिवेश- |
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