सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
कदा स्वप्नान्तो भवति ? इत्युच्यते-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम भवति पुरुषस्य स्वप्स्यतः प्रसिद्धं हि लोके स्वपितीति । गौणं चेदं नामेत्याह-यदा स्वपितीत्युच्यते पुरुषः, तदा तस्मिन्काले सता सच्छब्दवाच्या प्रकृतया देवतया सम्पन्नो भवति सङ्गत एकीभूतो भवति । मनसि प्रविष्टं मनआदिसंसर्गकृतं जीवरूपं परित्यज्य स्वं सद्रूपं यत्परमार्थसत्यमपीतोऽपि गतो भवति । अतस्तस्मात्स्वपितीत्येनमाचक्षते लौकिकाः । स्वमात्मानं हि यस्मादपीतो भवति । गुणनामप्रसिद्धितोऽपि स्वात्मप्राप्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायः ।स्वप्नान्त होता कब है ? सो बतलाते हैं जिस समय सोनेवाले पुरुषका 'स्वपिति' ऐसा नाम होता है। लोकमें स्वपिति (सोता है) ऐसा व्यवहार प्रसिद्ध है। तथा यह नाम गौण (गुणसम्बन्धी) है-इस आशयसे कहते हैं-जिस समय यह पुरुष 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है उस समय यह सत्‌से-प्रकरण प्राप्त 'सत्' शब्दवाच्य देवतासे सम्पन्न-संगत अर्थात् एकीभूत हो जाता है। यह मनमें प्रविष्ट हुआ मन आदिके संसर्गसे प्राप्त हुए जीवरूपको त्यागकर अपने सद्रूपको, जो कि परमार्थ सत्य है, प्राप्त हो जाता है। इसीसे लौकिक पुरुष इसे 'स्वपिति' ऐसा कहकर पुकारते हैं; क्योंकि यह 'स्वम्'—आत्माको 'अपीतः'-प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस गौण नामकी प्रसिद्धिसे भी अपने आत्माकी प्राप्ति ज्ञात होती है।
कथं पुनर्लौकिकानां प्रसिद्धा स्वात्मसम्पत्तिः । जाग्रच्छ्रमनिमित्तोद्भवत्वात्स्वापस्येत्याहुः ।किंतु लौकिक पुरुषोंको स्वात्माकी प्राप्ति कैसे प्रसिद्ध हुई ? [ऐसा प्रश्न होनेपर] आचार्योंने कहा है-'क्योंकि सुषुप्ति जाग्रत् अवस्थाके श्रमके कारण होती है [इसलिये उसे लोकमें स्वात्मप्राप्ति कहते हैं] ।
जागरिते हि पुण्यापुण्यनिमित्तसुख-जाग्रत् अवस्थामें पुरुष पुण्य-पापके

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
दुःखाद्यनेकायासानुभवाच्छ्रान्तो भवति; ततश्चायस्तानां करणानामनेकव्यापारनिमित्तग्लानानां स्वव्यापारेभ्य उपरमो भवति । <br><br> श्रुतेश्च “श्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः” ( बृ० उ० १ । ५ । २१ ) इत्येवमादि । तथा च “गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः” ( बृ० उ० २ । १ । १७) इत्येवमादीनि करणानि प्राणग्रस्तानि; प्राण एकोऽश्रान्तो देहे कुलाये यो जागर्ति, तदा जीवः श्रमापनुत्तये स्वं देवतारूपमात्मानं प्रतिपद्यते । <br><br> नान्यत्र स्वरूपावस्थानाच्छ्रमापनोदः स्यादिति युक्ता प्रसिद्धिर्लौकिकानां स्वं ह्यपीतो भवतीति।कारण होनेवाले सुख-दुःख आदि अनेक प्रकारका श्रम अनुभव करनेसे थक जाता है । उसके कारण पीड़ित अर्थात् अनेक प्रकारके व्यापाररूप निमित्तसे शिथिल हुई इन्द्रियोंकी अपने व्यापारोंसे निवृत्ति हो जाती है । <br><br> “वाक् भी थक जाती है और चक्षु भी थक जाती है” इत्यादि श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । इसी प्रकार “[ सुषुप्तिमें विज्ञानमय आत्माद्वारा ] वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है, श्रोत्र गृहीत हो जाते हैं और मन गृहीत हो जाता है” इस प्रकार ये सब इन्द्रियाँ प्राणसे गृहीत हो जाती हैं; एक प्राण ही अश्रान्त रहता है जो कि देहरूप घरमें जागता रहता है । उस समय जीव श्रमकी निवृत्तिके लिये अपने स्वाभाविक देवतारूपको प्राप्त हो जाता है, <br><br> क्योंकि स्वरूपमें स्थित होनेके सिवा और कहीं श्रमकी निवृत्ति नहीं हो सकती—इसलिये उस समय वह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है, ऐसी लौकिक पुरुषोंकी प्रसिद्धि ठीक ही है ।