छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
५७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥
क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ २ ॥
| अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य यथोक्तवैश्वानरविज्ञानवतः सर्वेषु लोकेष्वित्याद्युक्तार्थम् । हुतमन्नमत्तीत्यनयोरेकार्थत्वात् ॥ २ ॥ | क्योंकि जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उस उपर्युक्त वैश्वानर विद्यावान्का 'सर्वेषु लोकेषु' इत्यादि शब्दोंका अर्थ पहले (छा० ५ । १८ । १ के भाष्यमें) कहा जा चुका है, क्योंकि यहाँके 'हुतम्' और वहाँके 'अन्नम् अत्ति' इन दोनों पदोंका एक ही अर्थ है ॥२॥ |
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| किं च— | तथा— |
तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवंऽहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति॥३॥
इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है--जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं ॥ ३ ॥
| तद्यथेषीकायास्तूलमग्रमग्नौ प्रोतं प्रक्षिप्तं प्रदूयेत प्रदह्येत | इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार सींकका तूल—अग्रभाग अग्नि- |
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खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५७१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| क्षिप्रमेवं हास्य विदुषः सर्वात्मभूतस्य सर्वान्नानामत्तुः सर्वे निरवशिष्टाः पाप्मानो धर्माधर्माख्या अनेकजन्मसम्व्रिता इह, च प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्ज्ञानसहभाविनश्च प्रहूयन्ते प्रदह्येन्वर्तमानशरीरारम्भकपाप्मवर्जम् ; लक्ष्यं प्रति मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तस्य न दाहः । य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति भुङ्क्ते ॥ ३ ॥ | में डालनेपर तुरन्त ही जल जाता है उसी प्रकार सबके अन्तरात्मभूत और समस्त अन्नोंके भोक्ता इस विद्वान्के अनेकों जन्मोंमें संचित हुए तथा इस जन्ममें ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व और ज्ञानके साथ-साथ होनेवाले धर्माधर्मसंज्ञक समस्त-निःशेष पाप दग्ध हो जाते हैं; केवल वर्तमान शरीरका आरम्भ करनेवाले पाप रह जाते हैं, क्योंकि लक्ष्यके प्रति छोड़े हुए बाणके समान फल देनेमें प्रवृत्त हो जानेके कारण उनका दाह नहीं हो सकता है। जो इस (वैश्वानरदर्शन) को इस प्रकार जाननेवाला होकर हवन करता यानी भोजन करता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ] ॥ ३ ॥ |
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतँस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥
अतः वह इस प्रकार जाननेवाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा। इस विषयमें यह मन्त्र है ॥ ४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| स यद्यपि चाण्डालायोच्छिष्टानर्हायोच्छिष्टं प्रयच्छेदुच्छिष्टं दद्यात्प्रतिषिद्धमुच्छिष्टदानं यद्यपि | वह यद्यपि उच्छिष्टदानके अयोग्य चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे अर्थात् प्रतिषिद्ध उच्छिष्टदान भी |