छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| एवमीक्षित्वा तत्तेजोऽसृजत तेजः सृष्टवत् । | इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेजकी रचना की । |
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| ननु “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० १) इति श्रुतिमिह कथं प्राथम्येन तस्मादेव तेजः सृज्यते तत एव चाकाशमिति विरुद्धम् । | शङ्का—किंतु “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ [ तथा आकाशसे वायु और वायुसे तेज हुआ ]” ऐसी भी श्रुति है। फिर उसीसे सबसे पहले तेज रचा गया और उसीसे आकाश—यह विरुद्ध कथन क्यों किया जाता है ? |
| नैष दोषः; आकाशवायुसर्गानन्तरं तत्सत्तेजोऽसृजतेतिकल्पनोपपत्तेः । अथ वाविवक्षित इह सृष्टिक्रमः । सत्कार्यमिदं सर्वमतःसदेकमेवाद्वितीयमित्येतद्विवक्षितम्, मृदादिदृष्टान्तात् । अथवा त्रिवृत्करणस्य विवक्षितत्वात्तेजोऽबन्नानामेव सृष्टिमाचष्टे तेज इति प्रसिद्धं लोके दग्धृ पक्तृ प्रकाशकं रोहितं चेति । | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि आकाश और वायुकी रचनाके अनन्तर उस सत्ने तेजकी रचना की । अथवा यह भी सम्भव है कि यहाँ सृष्टिक्रम बतलाना इष्ट न हो । यह सारा जगत् सत्का कार्य है, इसलिये एकमात्र अद्वितीय सत् ही है—यही बतलाना इष्ट हो, क्योंकि यहाँ मृत्तिका आदिका दृष्टान्त दिया गया है ! अथवा त्रिवृत्करण विवक्षित होनेके कारण श्रुति तेज, अप् और अन्नकी ही सृष्टिका निरूपण करती है । तेज—यह दग्ध करनेवाला, पकानेवाला, प्रकाशक और कुछ लाल रंगका लोकमें प्रसिद्ध है । |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९
| तत्सत्सृष्टं तेज ऐक्षत तेजोरूपसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बहु स्यां प्रजायेयेति पूर्ववत् । तदपोऽसृजत । आपो द्रवाः स्निग्धाः स्यन्दिन्यः शुक्लाश्चेति प्रसिद्धा लोके । यस्मात्तेजसः कार्यभूता आपस्तस्माद्यत्र क्व च देशे काले वा शोचति संतप्यते स्वेदते प्रस्विद्यते वा पुरुषस्तेजस एव तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥ ३ ॥ | सत्के रचे हुए उस तेजने ईक्षण किया; अर्थात् तेजके रूपमें स्थित सत्ने ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’, इस प्रकार पूर्ववत् ईक्षण किया । उसने जलकी रचना की । जल द्रवरूप, स्निग्ध, बहनेवाला और शुक्ल वर्ण इस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है । क्योंकि जल तेजका कार्यभूत है, इसलिये जब कहीं किसी देश या कालमें पुरुष शोक-संताप करता है तो पसीनेसे युक्त हो जाता है । उस समय तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ |
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ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥
उस जलने ईक्षण किया 'हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।' उसने अन्नकी रचना की । इससे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है । वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥
| ता आप ऐक्षन्त पूर्ववदेवापाकारसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बह्व्यः प्रभूताः स्याम भवेम प्रजायेमोत्पद्येमहीति । ता अन्न- | उस जलने ईक्षण किया, अर्थात् पहलेहीके समान जलरूपमें स्थित सत्ने ईक्षण किया । 'हम बहुत—अधिक हो जायँ, प्रकर्षसे उत्पन्न हों ।' उसने पृथिवीरूप अन्नकी |