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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५६४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किं च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥

प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी तृप्ति होनेपर स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥

प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति, चक्षुरादित्यो द्यौश्चेत्यादि तृप्यति यच्चान्यद्द्यौश्चादित्यश्च स्वामित्वेनाधितिष्ठतस्तच्च तृप्यति, तस्य तृप्तिमनु स्वयं भुञ्जानस्तृप्यत्येवं प्रत्यक्षम्। किञ्च प्रजादिभिश्च। तेजः शरीरस्था दीप्तिः, उज्ज्वलत्वं प्रागल्भ्यं वा; ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजः ॥२॥प्राणके तृप्त होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, इस प्रकार नेत्रेन्द्रिय, आदित्य, द्युलोक इत्यादि तृप्त होते हैं तथा और भी जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य स्वामिभावसे अधिष्ठित हैं वह सब तृप्त होता है। तथा उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोजन करनेवाला भी तृप्त होता है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। यही नहीं, भोक्ता प्रजादिके द्वारा भी तृप्त होता है। शरीरस्थ दीप्ति, उज्ज्वलता अथवा प्रगल्भताका नाम 'तेज' है तथा सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाला तेज 'ब्रह्मतेज' है ॥ २ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
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विंश खण्ड


'व्यानाय स्वाहा' इस दूसरी आहुतिका वर्णन

अथ यां द्वितीयां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति
व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति
श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति
दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किं च दिशश्च
चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति
प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥

तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है ॥ १ ॥ व्यानके तृप्त होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके पश्चात् वह भोक्ता प्रजा पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
विंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २० ॥

एकविंशं खण्ड


‘अपानाय स्वाहा’ इस तीसरी आहुतिका वर्णन

अथ या तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किं च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥

फिर जो तीसरी आहुति दे उसे ‘अपानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे अपान तृप्त होता है ॥ १ ॥ अपानके तृप्त होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्‌के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [ स्वामिभावसे ] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
एकविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २१ ॥

द्वाविंश खण्ड

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‘समानाय स्वाहा’ इस चौथी आहुतिका वर्णन

अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वा-
हेति समानस्तृप्यति ॥ १॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति
मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृ-
प्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किं च विद्युच्च पर्जन्य-
श्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया
पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥

तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे ‘समानाय स्वाहा’ ऐसा कहकर देना चाहिये; इससे समान तृप्त होता है ॥ १ ॥ समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
द्वाविंशखण्डः सम्पूर्णः ॥ २२ ॥

त्रयोविंश खण्ड

'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन

अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहे-
त्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति
त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृ-
प्यत्याकाशे तृप्यति यत्किं च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठ-
तस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिर-
न्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥

फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा कहकर देना चाहिये, इससे उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदानके तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्तिके पश्चात् स्वयं भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥

| अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीमिति समानम् ॥ ५ । २० — ५ । २३ ॥ | 'अथ यां द्वितीयां तृतीयां चतुर्थीं पञ्चमीम्' इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ समान है॥ ५ । २० — ५ । २३॥ |

इति च्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥

चतुर्विंश खण्ड

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अविद्वान्‌के हवनका स्वरूप

स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारान-
पोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥

वह जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें हवन करे ॥ १ ॥

| स यः कश्चिदिदं वैश्वानरदर्शनं यथोक्तमविद्वान्सन्नग्निहोत्रं प्रसिद्धं जुहोति, यथाङ्गारानाहुतियोग्यानपोह्यानाहुतिस्थाने भस्मनि जुहुयात्, तादृक् तत्तुल्यं तस्य तदग्निहोत्रहवनं स्याद्वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रमपेक्ष्येति प्रसिद्धाग्निहोत्रनिन्दया वैश्वानरविदोऽग्निहोत्रं स्तूयते ॥ १ ॥ | वह, जो कोई कि इस उपर्युक्त वैश्वानर-विद्याको न जाननेवाला होकर ही लोकप्रसिद्ध अग्निहोत्र करता है उसका वह हवन वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी अपेक्षा ऐसा है अर्थात् इसके सदृश है जैसे कि आहुतियोग्य अङ्गारोंको हटाकर कोई आहुति न देनेयोग्य स्थान—भस्ममें आहुति दे। इस प्रकार प्रसिद्ध अग्निहोत्रकी निन्दाद्वारा वैश्वानरोपासकके अग्निहोत्रकी स्तुति की जाती है ॥ १ ॥ |


विद्वान्‌के हवनका फल

| अतश्चैतद्विशिष्टमग्निहोत्रम् ।<br>कथम् ? | इसलिये भी यह विशिष्ट अग्निहोत्र है; किसलिये— |