छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
५२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| वरुरुक्षतां स्वर्गभोगनिमित्त-<br>कर्मक्षयान्मृदिताब्ददेहानां प्रति-<br>बद्धकरणानाम् । अतस्तेऽपरि-<br>त्यक्तदेहबीजभूताभिरद्भिर्मूर्च्छिता<br>इवाकाशादिक्रमेणेमामवरुह्य<br>कर्मनिमित्तजातिस्थावरदेहैः<br>संश्लिष्यन्ते । प्रतिबद्धकरणतया-<br>नुद्भूतविज्ञाना एव । | हैं तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अवरुद्ध हो<br>गयी हैं उन चन्द्रमण्डलसे मनुष्यादि<br>देहान्तरोंके प्रति गिरनेवाले अनुशयी<br>जीवोंकी [ विज्ञानशून्यता उचित ही<br>है ] । अतः देहके बीजभूत जलके<br>परित्यक्त न होनेसे वे उसके सहित<br>ही मूर्च्छित हुएके समान आकाशा-<br>दिक्रमसे इस पृथिवीपर उतरकर<br>अपने कर्मानुसार जातिवाले स्थावर-<br>शरीरोंमें मिल जातेहैं और इन्द्रियोंके<br>प्रतिबद्ध रहनेके कारण अनुद्भूतविज्ञान<br>(अचेत) ही रहते हैं । |
| तथा लवनकण्डनपेषणसं-<br>स्कारभक्षणरसादिपरिणामरेतः-<br>सेककालेषु मूर्च्छितवदेव, देहा-<br>न्तरारम्भकस्य कर्मणोऽलब्धवृ-<br>त्तित्वात् । देहबीजभूताप्तसंबन्धा-<br>परित्यागेनैव सर्वास्ववस्थासु<br>वर्तन्त इति जलूकावच्चेतनावत्त्वं<br>न विरुध्यते । अन्तराले त्ववि-<br>ज्ञानं मूर्च्छितवदेवेत्यदोषः । | इसी प्रकार वे काटने, कूटने,<br>पीसने, पकाने, खाने, रसादिरूपमें<br>परिणत होने और वीर्यसेचनके<br>समय भी मूर्च्छितसे ही रहते हैं,<br>क्योंकि उनका देहान्तरका आरम्भ<br>करनेवाला कर्म अलब्धवृत्ति रहता<br>है । वे समस्त अवस्थाओंमें देहके<br>बीजभूत जलका सम्बन्ध न छोड़ते<br>हुए ही विद्यमान रहते हैं, अतः<br>जोंकके समान उनके चेतनायुक्त<br>होनेमें भी कोई विरोध नहीं आता ।<br>बीचमें जो विज्ञानशून्य दशा रहती<br>है वह मूर्च्छितके समान है; इस-<br>लिये उसमें कोई दोष नहीं है । |
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थे ५२९
न च वैदिकानां कर्मणां हिंसायुकत्वेनोभयहेतुत्वं शक्यमनुमातुम्, हिंसायाः शास्त्रचोदितत्वात् "अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" इति श्रुतेः शास्त्रचोदिताया हिंसाया नाधर्महेतुत्वमभ्युपगम्यते । अभ्युपगतेऽप्यधर्महेतुत्वे मन्त्रैर्विषादिवत्तदपनयोपपत्तेर्न दुःखकार्यारम्भकत्वोपपत्तिर्वैदिकानां कर्मणां मन्त्रेणेव विषभक्षणस्येति ॥ ६ ॥
—: ० :—
अनुशयी जीवोंकी कर्मानुरूप गति
तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥
उन (अनुशयी जीवों) में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥