छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| भक्ष्यन्ते यदा, तदा रेतःसिग्भावं गतानां कर्मणो वृत्तिलाभः । | जाते हैं उसी समय वीर्यसेचक-रूपताको प्राप्त हुए उन जीवोंको कर्मोंकी वृत्तिका लाभ होता है। |
| कथम् ? यो यो ह्यन्नमत्त्यनुशयिभिः संश्लिष्टं रेतःसिक्, यश्च रेतः सिञ्चत्यृतुकाले योषिति तद्भूय एवतदाकृतिरेव भवति; तदवयवाकृतिभूयस्त्वं भूय इत्युच्यते, रेतोरूपेण योषितो गर्भाशयेऽन्तःप्रविष्टोऽनुशयी रेतसो रेतःसिगाकृतिभावितत्वात्, | किस प्रकार वृत्तिलाभ होता है ?—जो-जो वीर्यसेचक अनुशयी जीवोंसे युक्त अन्न भक्षण करता है और फिर ऋतुकालमें स्त्रीमें वीर्य-सेचन करता है वह जीव ‘तद्भूय’ अर्थात् उसीके आकारका हो जाता है। उसके अवयवोंकी आकृतिकी अधिकता होना ‘भूय’ ऐसा कहा जाता है। इस प्रकार वीर्यरूपसे स्त्रीके गर्भाशयमें प्रविष्ट हुआ जीव ‘तद्भूय’ हो जाता है’ क्योंकि वीर्य वीर्यसेचन करनेवालेकी आकृतिसे भावित होता है, जैसा कि |
| “सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतम्” ( ऐ० उ० ४।१) इति हि श्रुत्यन्तरात् । अतो रेतःसिगाकृतिरेव भवतीत्यर्थः । तथा हि-पुरुषात्पुरुषो जायते गोर्गवाकृतिरेव न जात्यन्तराकृतिः, तस्माद्युक्तं तद्भूय एव भवतीति । | “वीर्य पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ तेज होता है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । इस लिये तात्पर्य यह है कि वह वीर्य सेचन करनेवालेकी ही आकृतिका हो जाता है । इसीसे पुरुषसे पुरुष और बैलसे बैलके आकारवाला ही प्राणी होता है, अन्य जातिकी आकृतिवाला नहीं होता । अतः वह ‘तद्भूय’ ही होता है—यह कथन ठीक ही है। |
| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५२५ |
|---|
| ये त्वन्येऽनुशयिभ्यश्चन्द्रमण्डलमना<br>रुह्यैवापापकर्मभिर्घोरैर्व्रीहियवादिभावं प्रतिपद्यन्ते, न<br>पुनर्मनुष्यादिभावम्, तेषां नानुशयिनासिव । दुर्निष्प्रपतरम् ।<br>कस्मात् ? कर्मणा हि तैर्व्रीहियवादिदेह उपात्त इति तदुपभोगनिमित्तक्षये व्रीह्यादिस्तम्बदेहविनाशे यथाकर्मार्जितं देहान्तरं<br>नवं नवं जलूकावत्संक्रमन्ते<br>सविज्ञाना एव; “सविज्ञानो<br>भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति” (बृ० उ० ४।४।२)<br>इति श्रुत्यन्तरात् । यद्यप्युपसंहृतकरणाः सन्तो देहान्तरं<br>गच्छन्ति तथापि स्वप्नवद्देहान्तरप्राप्तिनिमित्तकर्मोद्भावितवासनाज्ञानेन सविज्ञाना एव देहान्तरं<br>गच्छन्ति, श्रुतिप्रामाण्यात् । | किंतु जो अनुशयि जीवोंसे भिन्न<br>प्राणी अपने घोर पापकर्मोंके कारण<br>चन्द्रमण्डलपर आरूढ हुए बिना ही<br>व्रीहि-यवादि भावको प्राप्त होते हैं,<br>मनुष्यादि भावको प्राप्त नहीं होते,<br>उनका व्रीहि-यवादि भावसे निष्क्रमण<br>होना बहुत कष्टप्रद नहीं है। क्यों<br>नहीं है ? क्योंकि उन्होंने कर्मके<br>कारण ही व्रीहि-यवादि देह प्राप्त किया<br>है; अतः उस उपभोगके निमित्तका<br>क्षय होनेपर व्रीहि आदि स्तम्बदेहका<br>नाश हो जानेके कारण वे जान-बूझकर<br>एक तिनकेसे दूसरे तिनकेपर जानेवाली जोंकके समान अपने कर्मानुसार<br>उपार्जित अन्य नवीन-नवीन शरीरमें<br>विज्ञानयुक्त रहकर ही संक्रमण करते<br>हैं; जैसा कि “वह सविज्ञान<br>होता है और सविज्ञान रहता<br>हुआ ही अन्य शरीरमें संक्रमण<br>करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध<br>होता है। यद्यपि जीव इन्द्रियोंका उपसंहार (हृदयमें लय) हो जानेपर ही<br>देहान्तरमें जाते हैं, तथापि इस श्रुतिप्रमाणसे वे स्वप्नके समान देहान्तरकी<br>प्राप्तिके निमित्तभूत कर्मसे उत्पन्न क॑<br>हुई वासनाके विज्ञानसे सविज्ञान हुए<br>ही देहान्तरको प्राप्त होते हैं। |