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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रमा<br>अतः स साम ॥ ४ ॥ | चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है इसलिये [नक्षत्रोंके ऋक्स्थानीय होनेपर] वह साम है ॥ ४ ॥ |

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अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते ॥ ५ ॥

तथा यह जो आदित्यकी शुक्लज्योति है वही ऋक् है और उसमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता दिखायी देती है वह साम है । वह यह [ नीलवर्णरूप ] साम इस [ शुक्लज्योतीरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है । अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ॥ ५ ॥

| अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः शुक्ला दीप्तिः सैवर्क् । अथ यदादित्ये नीलं परः कृष्णं परोऽतिशयेन कार्ष्ण्यं तत्साम, तद्ध्येकान्तसमाहितदृष्टेर्दृश्यते ॥ ५ ॥ | तथा यह जो आदित्यकी शुक्ल प्रभा—शुक्ल दीप्ति है वही ऋक् है । तथा आदित्यमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है; किन्तु वह तो एकमात्र समाहित दृष्टिवाले पुरुषको ही दिखायी देती है ॥ ५ ॥ |

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अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥

तथा यह जो आदित्यका शुक्ल प्रकाश है वही 'सा' है और जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वही 'अम' है, ये ही दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३


जो आदित्यमण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय-सा पुरुष दिखायी देता है, जो सुवर्णके समान श्मश्रुओंवाला (दाढ़ी-मूँछोंवाला) और स्वर्णसदृश केशोंवाला है तथा जो नखपर्यन्त सारा-का-सारा सुवर्ण-सा ही है ॥ ६ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ते एवैते भाः शुक्लकृष्णत्वे सा चामश्च साम। अथ य एषोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्तर्मध्ये हिरण्मयो हिरण्मय इव हिरण्मयः। न हि सुवर्णविकारत्वं देवस्य संभवति ऋक्सामगेष्णत्वापहतपाप्मत्वासंभवात्। न हि सौवर्णेऽचेतने पाप्मादिप्राप्तिरस्ति येन प्रतिषिध्येत। चाक्षुषे चाग्रहणात्। अतो लुप्तोपम एव हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्यर्थः। उत्तरेष्वपि समाना योजना।वे ही ये शुक्लत्व एवं कृष्णत्वरूप प्रकाश क्रमशः 'सा' और 'अम' होनेके कारण साम हैं। तथा यह जो आदित्यके अन्तर्गत—आदित्यके मध्यमें हिरण्मय—सुवर्णमयके सदृश होनेके कारण सुवर्णमय [साक्षात् सुवर्णका नहीं], क्योंकि सूर्यदेवका सुवर्णके विकाररूप होना, सम्भव नहीं है; [विकाररूप होनेपर] उनका ऋक् एवं सामरूप पंखोंवाला तथा निष्पाप होना सम्भव न होगा; क्योंकि सुवर्णमय अचेतन पदार्थोंमें तो पाप आदिकी सम्भावना ही नहीं है, जिसके कारण उनका प्रतिषेध किया जाय। इसके सिवा, नेत्रस्थ उपास्य पुरुषमें सुवर्णविकारत्वका ग्रहण भी नहीं किया जाता। इसलिये यह हिरण्मय शब्द लुप्तोपम ही है* अतः इसका अर्थ ज्योतिर्मय है। आगेके हिरण्मयादि शब्दोंका अर्थ भी इसीके समान लगाना चाहिये।

* अर्थात् इसके आगे उपमावाचक 'इव' शब्दका लोप हुआ है।