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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
५०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
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| ५०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| च विशेषणार्थवत्त्वायान्यत्रावृत्तिः कल्पनीया। | है। इसलिये 'इमम्' और 'इह' इन विशेषणोंकी सार्थकताके लिये उसकी अन्यत्र आवृत्ति माननी चाहिये।* |
| न च 'सदेकमेवाद्वितीयम्' आत्मविदोऽनु- इत्येवं प्रत्ययवतां क्रान्तिनिरूपणम् मूर्धन्यनाड्यार्चिरादिमार्गेण गमनम्, 'ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति' (बृ० उ० ४ । ४ । ६)। "तस्मात्तत्सर्वमभवत्" (बृ० उ० १ । ४ । १०)। "न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति। अत्रैव समवलीयन्ते" (बृ० उ० ४ । ४ । ६) इत्यादि श्रुतिशतेभ्यः। | इसके सिवा जिनका ऐसा अनुभव है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही है' उनका शीर्षस्थानीय नाडीद्वारा अर्चिरादि मार्गसे गमन भी नहीं होता; जैसा कि "वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है" "इसीसे यह सब कुछ हो गया" "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, यहीं लीन हो जाते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। |
| ननु तस्माज्जीवादुच्चिक्रमिषोः प्राणा नोत्क्रामन्ति सहैव गच्छन्तीत्ययमर्थः कल्प्यत इति चेत् ? | शङ्का—यदि इस श्रुतिका ऐसा अर्थ माना जाय कि उत्क्रमण करनेकी इच्छावाले उस जीवके पाससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते, बल्कि उसके साथ ही जाते हैं, तो ? |
| न; 'अत्रैव समवलीयन्ते' इति विशेषणानर्थक्यात्, "सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति" (बृ० उ० ४ । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे 'यहीं लीन हो जाते हैं' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। तथा इसके सिवा "सब प्राण उसका अनुगमन करते हैं" |
* अर्चिमार्गसे जानेवाले पुरुषकी इस लोकमें तो आवृत्ति नहीं होती; किंतु ब्रह्मलोकमें ही ऐसे कई लोक हैं जिनमें वह अपने तपके प्रभावसे जाता है। महः, जनः, तपः और सत्य—ये चारों ही लोक ब्रह्मलोकके अन्तर्गत हैं। साधक अपनी साधनाके प्रभावसे इनमेंसे किसी एक लोकमें जाता है और फिर वहाँसे ज्ञानद्वारा उत्तरोत्तर लोकमें जाता हुआ सत्यलोकमें पहुँचकर मुक्त हो जाता है। यह लोकान्तरगमन ही उसकी अन्यत्र आवृत्ति है।
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खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| ४।२) इति च प्राणैर्गमनस्य प्राप्तत्वात्। तस्मादुत्क्रामन्तीत्यनाशङ्कवैषा। | इस श्रुतिसे प्राणोंके सहित जीवका गमन सिद्ध भी होता है। अतः ‘प्राण उत्क्रमण करते हैं’ इस विषयमें कोई शङ्का नहीं हो सकती। |
| यदापि मोक्षस्य संसारगतिवैलक्षण्यात्प्राणानां जीवेन सहागमनमाशङ्क्य तस्मान्नोत्क्रामन्तीत्युच्यते, तदाप्यत्रैव समवलीयन्त इति विशेषणमनर्थकं स्यात्। न च प्राणैर्वियुक्तस्य गतिरुपपद्यते जीवत्वं वा। सर्वगतत्वात्सदात्मनो निरवयवत्वात् प्राणसंबन्धमात्रमेव ह्यग्निविस्फुलिङ्गवज्जीवत्वभेदकारणमित्यतस्तद्वियोगे जीवत्वं गतिर्वा न शक्या परिकल्पयितुं श्रुतयश्चेत्प्रमाणम्। | इसके सिवा संसारगतिसे मोक्षकी विलक्षणता होनेके कारण जब कि जीवके साथ प्राणोंके न जानेकी आशङ्का करके ऐसा कहा जाता है कि वे उससे उत्क्रमण ही नहीं करते [अर्थात् जीव प्राणोंके बिना ही चला जाता है] तो उस समय भी ‘वे यहीं लीन हो जाते हैं’ यह विशेषण व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि प्राणोंसे वियुक्त हुए प्राणीकी गति अथवा जीवत्व सम्भव ही नहीं है। क्योंकि सदात्मा तो सर्वगत और निरवयव है; प्राणसे सम्बन्ध होना ही अग्निके विस्फुलिङ्गोंके समान जीवभावरूप भेदका कारण है। अतः यदि श्रुतिको प्रमाण माना जाय तो प्राणोंका वियोग हो जानेपर चिदात्माके जीवत्व अथवा गतिकी कल्पना नहीं की जा सकती। |
| न च सतोऽणुरवयवः स्फुटितो जीवाख्यः सद्रूपं छिद्रीकुर्वन् गच्छतीति शक्यं कल्पयितुम्। | इसके सिवा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि सदात्माका उससे अलग हुआ अणुमात्र अवयव जीवसंज्ञक है और वह सदात्माको छिद्रयुक्त करता हुआ जाता है। |