छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- | दीर्घकालपर्यन्त शयन करनेके अनन्तर [ जन्म लेना भी वैराग्यका ही हेतु है ] ॥ १ ॥ |
| त्वेति च ॥ १ ॥ | |
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स जातो यावदायूषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २॥
इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है। फिर मरनेपर कर्मवश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था ॥२॥
| स एवं जातो यावदायूषं पुनः | इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवागमनके लिये |
| पुनर्घटीयन्त्रवद्गमनागमनाय कर्म | |
| कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- | अथवा कुलालचक्रके समान चारों ओर चक्कर काटनेके लिये कर्म करता हुआ कर्मद्वारा जितनी आयु |
| णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ताव- | प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण |
| ज्जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं | हो गयी है ऐसे इस प्रेत—मृत एवं |
| मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर- | दिष्ट—कर्मद्वारा परलोकके प्रति नियुक्त किये हुए इस जीवको—क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो |
| लोकं प्रति यदि चेज्जीवन्वौदिके | कर्म अथवा ज्ञानका अधिकारी होता अतः उस मरे हुए प्राणीको यहाँसे—इस ग्रामसे ऋत्विक् अथवा |
| कर्मणि ज्ञाने वाधिकृतस्तमेनं | |
| मृतमितोऽस्माद्ग्रामादग्नयेऽग्न्य- | |
| र्थमृत्विजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- | |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| कर्मणे । यत एवेत आगतोऽग्नेः सकाशाच्छ्रद्धाद्याहुतिक्रमेण, यतश्च पञ्चम्योऽग्निभ्यः संभूत उत्पन्नो भवति, तस्मा एवाग्नये हरन्ति स्वामेव योनिमग्निमापादयन्तीत्यर्थः ॥ २ ॥ | पुत्रगण अन्त्येष्टि कर्मके लिये अग्निके प्रति ले जाते हैं, जिस अग्निसे कि श्रद्धा आदि आहुतियोंके क्रमसे वह यहाँ आया था तथा जिन पाँच अग्नियोंसे वह उत्पन्न होता है, उस अग्निके प्रति ही वे इसे ले जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उसे अपनी योनिभूत अग्निको ही प्राप्त करा देते हैं ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
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प्रथम प्रश्नका उत्तर
| वेत्थ यदितोऽधि प्रजा प्रयन्तीत्ययं प्रश्नः प्रत्युपस्थितोऽपाकर्त्तव्यतया । | अब, 'क्या तू जानता है कि इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती है ?' ऐसा यह प्रश्न निराकरणके लिये प्रस्तुत किया जाता है । |
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तद्य इत्थं विदुः। ये चे मेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासाँस्तान् ॥ १ ॥
मासेभ्यः संवत्सरग्ँ संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥
वे जो कि इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो कि वनमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं; अर्चिके अभिमानी देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको; शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको ॥ १ ॥ उन महीनोंसे संवत्सरको; संवत्सरसे आदित्यको; आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्म ( कार्यब्रह्म ) को प्राप्त करा देता है। यह देवयानमार्ग है ॥ २ ॥
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
| [गृहस्थेषु विदुषामुत्तरमार्गः कर्मिणां च दक्षिणमार्ग इति स्थापनम्]<br><br>तत्तत्र लोकं प्रत्युत्थितानामधिकृतानां गृहमेधिनां य इत्थमेवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनं द्युलोकाद्यग्निभ्यो वयं क्रमेण जाता अग्निसस्वरूपाः पञ्चाग्न्यात्मान इत्येवं विदुर्जानीयूः ।<br><br>कथमवगम्यत इत्थं विदुरिति गृहस्था एवोच्यन्ते नान्य इति ?<br><br>गृहस्थानां ये त्वनित्थंविदः केवलेष्टापूर्तदत्तपरास्ते धूमादिना चन्द्रं गच्छन्तीति वक्ष्यति । ये चारण्योपलक्षिता वैखानसाः परिव्राजकाश्च श्रद्धा तप इत्युपासते तेषां चेत्थंविद्भिः सहार्चिरादिना गमनं वक्ष्यति पारिशेष्यादग्निहोत्राहुतिसंबन्धाच्च गृहस्था एव गृह्यन्त इत्थं विदुरिति । | वहाँ इस लोकके प्रति उत्थित हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इस प्रकार यानी उपर्युक्त पञ्चाग्निविद्याको जानते हैं अर्थात् जो ऐसा समझते हैं कि द्युलोकादि अग्नियोंसे क्रमशः उत्पन्न हुए हमलोग अग्नित्वरूप यानी पञ्चाग्निमय हैं [ वे अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं ] ।<br><br>शङ्का—'इत्थं विदुः' इस [सामान्य निर्देश] से यह कैसे जाना गया कि यहाँ गृहस्थोंके विषयमें ही कहा गया है, औरोंके लिये नहीं ?<br><br>**समाधान—**गृहस्थोंमें जो ऐसा जाननेवाले नहीं हैं, बल्कि केवल इष्टापूर्त्त एवं दत्त कर्मोंमें ही लगे रहते हैं वे धूमादिके द्वारा चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा श्रुति आगे कहेगी; तथा जो 'अरण्य' पदसे उपलक्षित वानप्रस्थ एवं संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इनकी उपासना करते हैं उनका तो इस प्रकार जाननेवालोंके साथ गमन करना श्रुति आगे कहेगी; अतः परिशेषसे और अग्निहोत्रकी आहुतियोंका सम्बन्ध होनेके कारण भी 'इत्थं विदुः' इस कथनसे गृहस्थोंका ही ग्रहण होता है । |