छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं, उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेर्गर्भः संभवतीति; एवं श्रद्धासोमवर्षान्नरेतोहवनपर्यायक्रमेणाप एव गर्भीभूतास्ताः। तत्रापामाहुतिसमवायित्वात्प्राधान्यविवक्षाः आपः पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचसो भवन्तीति। न त्वाप एव केवलाः सोमादिकार्यमारभन्ते, न चापोऽत्रिवृत्कृताः सन्तीति। त्रिवृत्कृतत्वेऽपि विशेषसंज्ञालाभो दृष्टः पृथिवीयमिमा आपोऽयमग्निरित्यन्यतमबाहुल्यनिमित्तः। | उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है—इस प्रकार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न और रेतःरूप आहुतियोंके हवनके पर्यायक्रमसे वह जल ही गर्भरूपमें परिणत होता है। उनमें आहुतियोंसे सम्बद्ध होनेके कारण श्रुतिको जलकी ही प्रधानता बतलानी अभीष्ट है, इसीसे उसने कहा है कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है। केवल जल ही सोमादि कार्य आरम्भ कर देते हों—यह बात नहीं है, और न जल अत्रिवृत्कृत (पृथिवी, जल और तेज इन तीनोंके सम्मिश्रणसे रहित) हों—ऐसी ही बात है। त्रिवृत्कृत होनेपर भी एक-एक भूतकी बहुलताके कारण उनमेंसे प्रत्येकको 'यह पृथिवी है, यह जल है, यह अग्नि है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम प्राप्त होता देखा जाता है। अतः जलकी |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९५
| तस्मात्समुदितान्येव भूतान्यब्वाहुल्यात्कर्मसमवायीनि सोमादिकार्यारम्भकाण्याप इत्युच्यन्ते । दृश्यते च द्रवबाहुल्यं सोमवृष्ट्यन्नरेतोदेहेषु । बहुद्रवं च शरीरं यद्यपि पार्थिवम् । तत्र पञ्चम्यामाहुतौ हुतायां रेतोरूपा आपो गर्भीभूताः ॥ २ ॥ | बहुलता होनेके कारण कर्ममें सम्मिलित हुए सभी भूत सोमादिकार्य आरम्भ करनेवाले 'जल' कहे जाते हैं । इसके सिवा सोम, वृष्टि, अन्न, वीर्य और देहमें द्रवत्वकी बहुलता भी देखी ही जाती है । शरीर यद्यपि पार्थिव होता है, तो भी उसमें द्रवकी अधिकता होती है । उनमें पाँचवीं आहुतिके हुत होनेपर वीर्यरूप जल गर्भमें परिणत हो जाता है [अर्थात् 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है ] ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
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पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए जलकी गति
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भव-
न्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासा-
न्नन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' शब्दवाची हो जाते हैं। वह जरायुसे आवृत हुआ गर्भ दस या नौ महीने अथवा जवतक [पूर्णाङ्ग नहीं होता तबतक माताकी कुक्षिके] भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
| इति त्वेवं तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति व्याख्यात एकः प्रश्नः यत्तु द्युलोकादिमां प्रत्यावृत्तयोराहुत्योः पृथिवीं पुरुषं स्त्रियं क्रमेणाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतीति वाजसनेयक उक्तं तत्प्रासङ्गिकमिहोच्यते । इह च प्रथमे प्रश्ने उक्तम् 'वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ?' तस्य चायमुपक्रमः । | इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है—इस एक प्रश्नकी व्याख्या हुई। तथा वाजसनेय-श्रुतिमें जो द्युलोकसे पृथिवीकी ओर आयी हुई दो आहुतियोंके विषयमें यह कहा गया है कि वे क्रमशः पृथिवी, पुरुष और स्त्रीमें प्रवेश कर परलोकके प्रति उत्थान करनेवाली होती है, उसका भी प्रसङ्गवश यहाँ वर्णन कर दिया जाता है। यहाँ जो पहले प्रश्नमें कहा गया है कि 'क्या तुम जानते हो कि यह प्रजा [मरनेके अनन्तर] यहाँसे कहाँ जाती है?' उसका यह उपक्रम है। |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| स गर्भोऽपां पञ्चमः परिणामविशेष आहुतिकर्मसमवायिनीनां श्रद्धाशब्दवाच्यानामुल्बावृत उल्वेन जरायुणावृतो वेष्टितो दश वा नव वा मासानन्तर्मातुः कुक्षौ शयित्वा यावद्वा यावता कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन वाथानन्तरं जायते। | आहुतिकर्मसे सम्बद्ध 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका पञ्चम परिणाम-विशेष वह गर्भ उल्बावृत—उल्ब अर्थात् जरायुसंज्ञक गर्भवेष्टन चर्मसे आवृत-वेष्टित हुआ दश या नौ मासतक अथवा जितने भी न्यून या अधिक समयमें पूर्णान्न हो, माताकी कुक्षिमें शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है। |
| उल्बावृत इत्यादि वैराग्यहेतोरिदमुच्यते। कष्टं हि मातुः कुक्षौ मूत्रपुरीषवातपित्तश्लेष्मादिपूर्णे तदनुलिप्तस्य गर्भस्योल्वाशुचिपटावृतस्य लोहितरेतोऽशुचिबीजस्य मातुरशितपीतरसानुप्रवेशेन विवर्धमानस्य निरुद्धशक्तिबलवीर्यतेजः प्रज्ञाचेष्टस्य शयनम्। ततो योनिद्वारेण पीड्यमानस्य कष्टतरा निःसृतिर्जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति। मुहूर्तमप्यसह्यं दश वा नव वा | उल्बावृत इत्यादि यह सब कथन वैराग्यके लिये है। उल्बरूप अपवित्र वस्त्रसे लिपटे हुए, रज और वीर्यरूप अपवित्र बीजवाले, माताके खाये-पीये पदार्थोंके रसके प्रवेशसे बढ़नेवाले तथा जिसके शक्ति, बल, वीर्य, तेज, बुद्धि और चेष्टा—ये सब निरुद्ध (अविकसित) रहते हैं उस गर्भका माताकी मल-मूत्र-वात-पित्त एवं कफादिसे भरी हुई कुक्षिमें शयन करना कष्टमय ही है। उससे भी अधिक कष्टप्रद योनिद्वारसे पीडित हुए गर्भका बाहर निकलनारूप जन्म है; इस प्रकार श्रुति वैराग्यका ग्रहण कराती है। इसके सिवा जो एक मुहूर्त्तके लिये भी असह्य है उस मातृकुक्षिमें दश या नौ मासके |