छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| प्राणभूतत्वाद्विदुषः । "प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति" (बृ० १ । ५ । २३) इत्युपक्रम्य "एवंविदो ह वा उदेति सूर्य एवं विद्ध्यस्तमेति" इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | क्योंकि वह विद्वान् प्राणस्वरूप हो जाता है; जैसा कि एक दूसरी श्रुतिमें भी "प्राणसे ही यह सूर्य उदित होता और प्राणमें ही अस्त होता है" ऐसा उपक्रम कर "इस प्रकार जाननेवालेसे ही सूर्य उदित होता है और ऐसा जाननेवालेमें ही अस्त हो जाता है" [ऐसा उपसंहार किया गया है] ॥ १ ॥ |
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प्राणका वस्त्रनिर्देश
स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥
उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले—'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥
| स होवाच पुनः प्राणः, पूर्ववदेव कल्पना, किं मे वासो भविष्यति ? इति; आप इति होचुर्वागादयः । यस्मात्प्राणस्य वास आपः, तस्माद्वा एतदशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणा भुक्तवन्तश्च ब्राह्मणा विद्वांस एतत्कुर्वन्ति, किम्? अद्भिर्वासस्थानीयाभिः पुरस्ता- | उस प्राणने फिर कहा—यह कल्पना भी पहलेहीके समान है—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' इसपर वागादिने कहा—'जल' । क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है इसीसे भोजन करनेवाले विद्वान् यह करते हैं; क्या करते हैं ? भोजनके पूर्व और पश्चात् वे वस्त्रस्थानीय जलसे |
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| द्भोजनात्पूर्वमुपरिष्टाच्च भोजनादूर्ध्वं च परिदधति परिधानं कुर्वन्ति मुख्यस्य प्राणस्य । लम्भुको लम्भनशीलो वासो ह भवति, वाससो लब्धैव भवतीत्यर्थः । अनग्नो ह भवति, वाससो लम्भुकत्वेनार्थसिद्धैवानग्नतेत्यनग्नो ह भवतीत्युत्तरीयवान् भवतीत्येतत् । | मुख्य प्राणका परिधान (आच्छादन) करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह लम्भुक—वस्त्रोंका लम्भनशील अर्थात् वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला ही होता है और अनग्न होता है । वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला होनेसे अनग्नता अर्थतः सिद्ध ही है; अतः अनग्न होता है। इसका अभिप्राय यह है कि उत्तरीय वस्त्रसे युक्त होता है। |
| भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं शुद्धयर्थं विज्ञातं तस्मिन् प्राणस्य वास इति दर्शनमात्रमिह विधीयते । अद्भिः परिदधतीति नाचमनान्तरम् । यथा लौकिकैः प्राणिभिर्भक्ष्यमानमन्नं प्राणस्येति दर्शनमात्रम्, तद्वत् । किं मेऽन्नं किं मे वास इत्यादिप्रश्नप्रतिवचनयोस्तुल्यत्वात् । यद्याचमनमपूर्वं तादर्थ्येन क्रियेत | भोजन आरम्भ करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन शुद्धिके लिये विदित है उसमें 'यह प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया गया है । 'जलसे परिधान करता है' ऐसा कहकर किसी अन्य आचमनका विधान नहीं किया गया । जिस प्रकार लौकिक प्राणियोंद्वारा भक्षित होनेवाला अन्न प्राणका है—यहाँ जिस तरह केवल दृष्टिमात्रका विधान किया गया है उसी तरह इसे समझना चाहिये; क्योंकि 'मेरा अन्न क्या है ? मेरा वस्त्र क्या है '? इत्यादि प्रश्न और इनके उत्तर दोनों समान हैं । यदि [ इस श्रुतिके अनुसार ] प्राणके लिये अपूर्व—नवीन आचमनका विधान मान |