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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

४५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥

[ तदनन्तर ] श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राण करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १० ॥

मनकी परीक्षा

मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति ? यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥

[ तत्पश्चात् ] मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए जीवित रहते हैं उसी प्रकार [ हम भी जीवित रहे ] ।' यह सुनकर मनने भी प्रवेश किया ॥ ११ ॥

समानमन्यत्, चक्षुर्होच्चक्राम श्रोत्रं होच्चक्राम मनो होच्चक्रामेत्यादि । यथाचक्षुने उत्क्रमण किया, श्रोत्रने उत्क्रमण किया एवं मनने उत्क्रमण किया इत्यादि शेष समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य समान है । जिस प्रकार बालक 'अमना'—अप्ररूढमना
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५१

| बाला अमनसोऽप्ररूढमनस इत्यर्थः ॥ ९-११ ॥ | अर्थात् जिनका मन विकसित नहीं हुआ है ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ९-११ ॥ |

प्राणकी परीक्षा और विजय

| एवं परीक्षितेषु वागादिषु— | इस प्रकार वागादिकी परीक्षा हो चुकनेपर— |

अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तंहाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२॥

फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा 'भगवन् ! आप [हमारे स्वामी] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ १२ ॥

| अथानन्तरं ह स मुख्यः प्राण उच्चिक्रमिषन्नुत्क्रमितुमिच्छन्किमकरोत् ? इत्युच्यते—यथा लोके सुहयः शोभनोऽश्वः पड्वीशशङ्कन्पादबन्धनकीलान् परीक्षणायारूढेन कशया हतः सन्संखिदेत्समुत्खनेत्समुत्पाटयेत, एवमितरान्वागादीन्प्राणान्समखिदत्समुद्धृतवान् ।<br><br>ते प्राणाः संचालिताः सन्तः स्वस्थाने स्थातुमनुत्सहमाना | अथ—इसके पश्चात् उस मुख्य प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा करते हुए क्या किया ? सो बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपनी परीक्षाके लिये चढ़े हुए मनुष्यद्वारा चाबुकसे मारे जानेपर पैर बाँधनेकी कीलोंको उखाड़ डालता है उसी प्रकार उसने वाक् आदि अन्य प्राणोंको उखाड़ दिया अर्थात् [शरीरसे] बाहर निकाल लिया।<br><br>[इसी प्रकार] विचलित कर दिये जानेपर वे प्राण अपने गोलकोंमें स्थित रहनेमें असमर्थ होनेके कारण |


छा० उ० १५—