छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ४२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संवत्सरं संवत्सरदेवतां ततः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्तत्प्रस्थांस्तान् पुरुषः कश्चिद्ब्रह्मलोकादेत्यामानवो मानव्यां सृष्टौ भवो मानवो न मानवोऽमानवः स पुरुष एनान्ब्रह्म सत्यलोकस्थं गमयति गन्तृगन्तव्यगमयितृत्वव्यपदेशेभ्यः । सन्मात्रब्रह्मप्राप्तौ तदनुपपत्तेः । ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतीति हि तत्र वक्तुं न्याय्यम् । सर्वभेदनिरासेन सन्मात्रप्रतिपत्तिं वक्ष्यति । न चादृष्टो मार्गोऽग- | भिमानी देवताको प्राप्त होते हैं । फिर संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं । वहाँ स्थित हुए उन उपासकोंको कोई अमानव—जो मानवी सृष्टिमें होता है उसे 'मानव' कहते हैं जो मानव न हो उसीका नाम 'अमानव' है; ऐसा कोई अमानव पुरुष ब्रह्मलोकसे आकर सत्यलोकमें स्थित ब्रह्मके पास पहुँचा देता है,। गमन करनेवाले, गन्तव्य स्थान और गमन करानेवालेका उल्लेख होनेके कारण [ यहाँ कार्यब्रह्म ही अभिप्रेत है ] क्योंकि सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिमें यह कुछ नहीं कहा जा सकता । वहाँ तो यही कहना न्याय्य है कि 'वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है'। आगे छठे (अध्यायमें) श्रुति सम्पूर्ण भेदके बाधद्वारा सन्मात्र ब्रह्मकी प्राप्तिका उल्लेख करेगी ।* तथा बिना देखा हुआ [ एकत्वरूप ] मार्ग तो मोक्षमें उपयोगी ही नहीं हो सकता । जैसा कि |
* यहाँ यह शङ्का होती है कि जब परमार्थतः जीव ब्रह्म ही है तो ब्रह्मके उपासकका भी लोकान्तरमें जाना ठीक नहीं है । उसका भी मोक्ष ही हो जाना चाहिये । इसका समाधान करनेके लिये आगेकी बात कहते हैं ।
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| सनायोपतिष्ठते । “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति श्रुत्यन्तरात् । | “वह (परमात्मा) विदित न होनेपर इस अधिकारीका [मुक्ति प्रदान करके] पालन नहीं करता” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । |
| एष देवपथः, देवैरर्चिरादिभिर्गमयितृत्वेनाधिकृतैरुपलक्षितः पन्था देवपथ उच्यते । ब्रह्म गन्तव्यं तेन चोपलक्षित इति ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना गच्छन्तो ब्रह्मेमं मानवं मनुसंबन्धिनं मनोः सृष्टिलक्षणमावर्तं नावर्तन्त आवर्तन्तेऽस्मिञ्जनन-मरणप्रबन्धचक्रारूढा घटीयन्त्र-वत्पुनः पुनरित्यावर्तस्तं न प्रति-पद्यन्ते । नावर्तन्त इति द्विरुक्तिः सफलाया विद्यायाः परिसमाप्ति-प्रदर्शनार्था ॥ ५ ॥ | यह देवमार्ग है—उपासकको पहुँचानेके लिये अधिकारप्राप्त देवताओंसे उपलक्षित होनेके कारण यह मार्ग देवमार्ग कहलाता है, तथा ब्रह्म गन्तव्य (प्राप्तव्य) स्थान है, उससे उपलक्षित होता है, इसलिये वह ब्रह्ममार्ग है । इसके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त हुए अर्थात् जानेवाले उपासक इस मानव—मनुसम्बन्धी अर्थात् मनुकी सृष्टिरूप आवर्तमें नहीं लौटते । जिसमें जन्म-मरणके प्रवाहरूप चक्रपर चढ़े हुए प्राणी घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवर्तन करते हैं उस इस लोकको 'आवर्त' कहते हैं, इसे वे प्राप्त नहीं होते । ‘नावर्तन्ते नावर्तन्ते’ यह द्विरुक्ति फलके सहित विद्याकी परिसमाप्ति प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ ५ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
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</div>षोडश खण्ड
यज्ञोपासना
| रहस्यप्रकरणे प्रसङ्गादारण्यकत्वसामान्याच्च यज्ञे क्षत उत्पन्ने व्याहृतयः प्रायश्चित्तार्था विधातव्यास्तदभिज्ञस्य चर्त्विजो ब्रह्मणो मौनमित्यत इदमारभ्यते— | रहस्य (उपासना) के प्रकरणमें [मार्गोपदेशका] प्रसङ्ग होनेके कारण, [पूर्वोत्तर प्रकरणोंका] आरण्यकत्वमें सादृश्य होनेके कारण, और यज्ञमें कोई क्षत प्राप्त होनेपर उसके प्रायश्चित्तके लिये व्याहृतियोंका विधान करना है—तथा प्रायश्चित्तको जाननेवाले ऋत्विक् ब्रह्माके लिये मौनका विधान करना है—इसलिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— |
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एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳसर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳसर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥ १ ॥
यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ निश्चय इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है; क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग हैं ॥ १ ॥
| एष ह वा एष वायुर्योऽयं पवतेऽयं यज्ञः। ह वा इति प्रसिद्धार्थावद्योतकौ निपातौ। वायुप्रतिष्ठो हि यज्ञः प्रसिद्धः | ‘एष ह वै’—यह वायु जो कि चलता है, यज्ञ है। ‘ह’ और ‘वै’ ये प्रसिद्ध पदार्थके द्योतक निपात हैं। श्रुतियोंमें यह वायुरूप प्रतिष्ठावाला ही प्रसिद्ध है। जैसा कि |
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थं ४२९
| श्रुतिषु, "स्वाहा वाते धाः"¹ (यजु० २।२१ तथा ८।२१) "अयं वै यज्ञो योऽयं पवते" इत्यादिश्रुतिभ्यः । वात एव हि चलनात्मकत्वात्क्रियासमवायी । "वात एव यज्ञस्यारम्भको वातः प्रतिष्ठा" इति च श्रवणात् । | "यह यज्ञ आपके हाथमें सौंपता हूँ। आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।" "यह निश्चय यज्ञ ही है जो कि चलता है" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। चलनात्मक स्वरूप गुणवाला होनेके कारण वायुका ही क्रियासे समवाय-सम्बन्ध है; जैसा कि श्रुति कहती है—"वायु ही यज्ञका आरम्भक है और वायु ही उसकी प्रतिष्ठा है।" |
| एष ह यन्गच्छंश्चलन्निदं सर्वं जगत्पुनाति पावयति शोधयति । न ह्यचलतः शुद्धिरस्ति । दोष-निरसनं चलतो हि दृष्टं न स्थिरस्य । यद्यस्माच्च यन्नेषदं सर्वं पुनाति यस्मादेष एव यज्ञो यत्पुनातीति । | यह चलता—गमन करता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र—शुद्ध कर देता है। जो नहीं चलता [ अर्थात् विहित क्रियाका अनुष्ठान नहीं करता ] उसकी शुद्धि नहीं होती। दोषनिवृत्ति गतिशीलकी ही देखी जाती है, स्थिरकी नहीं देखी जाती; क्योंकि यह चलता हुआ इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है, क्योंकि पवित्र करता है। |
| तस्यास्यैवं विशिष्टस्य यज्ञस्य वाक्च मन्त्रोच्चारणे व्यापृता, मनश्च यथाभूतार्थज्ञाने व्यापृतम्, ते एते वाङ्मनसे वर्तनी मार्गों | उस इस प्रकारकी विशेषता-वाले यज्ञके मन्त्रोच्चारणमें प्रवृत्त वाणी और यथार्थ वस्तुके ज्ञानमें प्रवृत्त मन---ये दोनों अर्थात् वाणी और मन 'वर्तनी'--मार्ग हैं। जिन- |
१ इस मन्त्रकी एक अर्धाली इस प्रकार है- 'मनसस्पत इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः' अर्थात् 'हे चित्तके प्रवर्तक देव (परमेश्वर)! मैं यह यज्ञ आपके हाथोंमें सौंपता हूँ, आप इसे वायु देवतामें स्थापित करें।'