छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| र्शनं ब्रूयात्प्राणाविजायेरन्नुत्पद्ये-<br>रन्नेवास्मिन्स्थाणौ शाखाः प्ररो-<br>हेयुश्च पलाशानि पत्राणि। किमु<br>जीवते पुरुषाय ब्रूयादिति ॥ ३ ॥ | कहे तो उस स्थाणुमें शाखाएँ उत्पन्न<br>हो जायँ और पत्ते निकल आवें,<br>यदि जीवित पुरुषसे कहे तब तो<br>कहना ही क्या है ? ॥ ३ ॥ |
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मन्थकर्म
| यथोक्तप्राणदर्शनविद इदं<br>मन्थाख्यं कर्मारभ्यते--- | उपर्युक्त प्राणदर्शनके ज्ञाताके<br>लिये इस मन्थनामक कर्मका आरम्भ<br>किया जाता है— |
अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥
अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमावास्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये ॥ ४ ॥
| अथानन्तरं यदि महन्महत्त्वं<br>जिगमिषेद्गन्तुमिच्छेन्महत्त्वं प्रा-<br>प्तं यदि कामयेतेत्यर्थः, तस्येदं<br>कर्म विधीयते। महत्त्वे हि सति<br>श्रीरुपनमते। श्रीमतो ह्यर्थप्राप्तं<br>धनं ततः कर्मानुष्ठानं ततश्च | अब इसके पश्चात् यदि वह<br>महत् यानी महत्त्वको प्राप्त होना<br>चाहे अर्थात् महत्त्वप्राप्तिकी कामना<br>रखता हो तो उसके लिये इस<br>कर्मका विधान किया जाता है,<br>क्योंकि महत्त्व प्राप्त होनेपर ही लक्ष्मी<br>समीप आती है, क्योंकि श्रीमान्को<br>धन तो स्वतः प्राप्त होता ही है, उससे<br>कर्मानुष्ठान होता है और उससे |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५
| देवयानं पितृयाणं वा पन्थानं प्रतिपत्स्यत इत्येतत्प्रयोजनमुररीकृत्य महत्त्वप्रेप्सोरिदं कर्म न विषयोपभोगकामस्य। तस्यायं कालादिविधिरुच्यते—<br><br>अमावास्यायां दीक्षित्वा दीक्षित इव भूमिशयनादिनियमं कृत्वा तपोरूपं सत्यवचनं ब्रह्मचर्यमित्यादिधर्मवान्भूत्वेत्यर्थः। न पुनर्दैक्षमेव कर्मजातं सर्वमुपादत्ते, अतद्विकारत्वान्मन्थाख्यस्य कर्मणः। “उपसद्व्रती” (बृ० उ० ६।३।१) इति श्रुत्यन्तरात्पयोमात्रभक्षणं च शुद्धिकारणं तप उपादत्ते। पौर्णमास्यां रात्रौ कर्मारभते। सर्वौषधस्य ग्राम्यारण्यानामोषधीनां यावच्छक्त्यल्पमल्पमुपादाय तद्वितुषीकृत्याममेव पिष्टं दधिमधुनोरौदुम्बरे कंसाकारे चम- | देवयान अथवा पितृयाण मार्ग प्राप्त होना सम्भव है—इस उद्देश्यको लक्ष्यमें रखकर ही महत्त्वप्राप्तिकी इच्छावालेके लिये—विषयोपभोगकी कामनावालेके लिये नहीं—यह कर्म आरम्भ किया जाता है। उसकी यह कालादि विधि कही जाती है—<br><br>अमावास्याके दिन दीक्षित हो—दीक्षित पुरुषके समान भूमिशयन आदि नियम कर अर्थात् तपःस्वरूप-सत्यवचन, ब्रह्मचर्य इत्यादि धर्मवाला होकर पूर्णिमाकी रात्रिको इस कर्मका आरम्भ करता है। [इस कर्ममें दीक्षित होनेवाला पुरुष] दीक्षा-सम्बन्धी [मौञ्जीबन्धनादि] समस्त कर्मोंका ग्रहण नहीं करता, क्योंकि यह मन्थाख्य कर्म किसी अन्य कर्मका विकार नहीं है। “उपसद्व्रती भूत्वा” ऐसी अन्य श्रुति होनेके कारण वह शुद्धिका कारणभूत पयोभक्षणमात्र तप स्वीकार करता है। सर्वौषध अर्थात् यथाशक्ति ग्राम्य और वन्य समस्त ओषधियोंका थोड़ा-थोड़ा भाग लेकर उन्हें तुषरहित कर उसकी कच्ची पिट्ठीको एक अन्य श्रुतिके अनुसार दही और मधुके सहित कंसाकार अथवा चमसाकार |