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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
४०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
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| ४०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्पलवदेव । सुखमाकाशस्थं नेतरल्लौकिकम् । आकाशं च सुखाश्रयं नेतरद्भौतिकमित्यर्थः । | आकाशस्थित सुख ब्रह्म है अन्य लौकिक सुख नहीं तथा सुखके आश्रित रहनेवाला आकाश ब्रह्म है अन्य भौतिक आकाश नहीं।' |
| [विशेषणद्वयेऽन्यतरस्यायुक्तत्वशङ्कनम्]<br>नन्वाकाशं चेत्सुखेन विशेषयितुमिष्टमस्त्वन्यतरदेव विशेषणं यद्वाव कं तदेव खमित्यतिरिक्तमितरत् । यदेव खं तदेव कमिति पूर्वविशेषणं वा । | शङ्का— यदि यहाँ आकाशको सुखके द्वारा विशेषित करना इष्ट है तो कोई भी एक विशेषण रह सकता था; अर्थात् 'यद्वाव कं तदेव खम्' ऐसा एक विशेषण रह जाता, दूसरा 'यदेव खं तदेव कम्' यह विशेषण अधिक है। अथवा यदि 'यदेव कं तदेव कम्' यही रहे तो पहला विशेषण अधिक है।* |
| [उभयोरावश्यकताप्रदर्शनम्]<br>ननु सुखाकाशयोरुभयोरपि लौकिकसुखाकाशाभ्यां व्यावृत्तिरिष्टेत्यवोचाम । सुखेनाकाशे विशेषिते व्यावृत्तिरुभयोर्थप्राप्तैवेति चेत्सत्यमेवं किं तु सुखेन विशेषितस्यैवाकाशस्य ध्येयत्वं विहितं न त्वाकाशगुणस्य विशेष- | समाधान— किंतु इन सुख और आकाश दोनोंहीकी लौकिक सुख और आकाशसे व्यावृत्ति अभीष्ट है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यदि कहो कि सुखके द्वारा आकाशके विशेषित होनेपर दोनोंकी व्यावृत्ति स्वतः सिद्ध ही है तो यह ठीक है, किन्तु इससे सुखसे विशेषित आकाशका ही ध्येयत्व विहित होगा आकाशगुणसे युक्त विशेषणभूत सुखका ध्येयत्व विहित नहीं होगा; |
* तात्पर्य यह है कि इन दो उक्तियोंमेंसे किसी भी एक उक्तिसे श्रुतिका अभिप्राय सिद्ध हो सकता था; फिर दोनोंका कथन क्यों हुआ ?
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०७
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| जस्य सुखस्य ध्येयत्वं विहितं स्यात् । विशेषणोपादानस्य विशेष्यनियन्तृत्वेनैवोपक्षयात् । अतः खेन सुखमपि विशेष्यते ध्येयत्वाय । | क्योंकि विशेषणका ग्रहण अपने विशेष्यका नियन्त्रण करके ही समाप्त हो जाता है । इसलिये [ सुखका भी ] ध्येयत्व प्रतिपादन करनेके लिये आकाशसे सुखको भी विशेषित किया गया है । |
| कुतश्चैतन्निश्चीयते ? | शङ्का—किंतु ऐसा किस प्रकार निश्चय किया जाता है ? |
| कंशब्दस्यापि ब्रह्मशब्दसंबन्धात्मकं ब्रह्मेति । यदि हि सुखगुणविशिष्टस्य खस्य ध्येयत्वं विवक्षितं स्यात्कं खं ब्रह्मेति ब्रूयुरग्नयः प्रथमम् । न चैवमुक्तवन्तः; किं तर्हि ? कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति । अतो ब्रह्मचारिणो मोहापनयनाय कंखंशब्दयोरितरेतरविशेषणविशेष्यत्वनिर्देशो युक्त एव यद्वाव कमित्यादिः । | समाधान—'ब्रह्म' शब्दसे 'क' शब्दका भी सम्बन्ध होनेके कारण 'क' ब्रह्म है—ऐसा निश्चय होता है । यदि सुखगुणविशिष्ट आकाशका ही ध्येयत्व बतलाना इष्ट होता तो अग्निगण पहले 'कं खं ब्रह्म' ( सुखस्वरूप आकाश ब्रह्म है ) ऐसा कहते । किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं कहा; तो क्या कहा है ?—'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है, ऐसा कहा है । अतः ब्रह्मचारीके मोहकी निवृत्तिके लिये 'यद्वाव कम्' इत्यादि रूपसे 'क' और 'ख' दोनों ही शब्दोंको एक दूसरेके विशेषणविशेष्यरूपसे बतलाना उचित ही है । |
| तदेतदग्निभिरुक्तं वाक्यार्थमस्मद्बोधाय श्रुतिराह—प्राणं च | अग्नियोंके कहे हुए इस वाक्यके अर्थको श्रुति हमारे बोधके लिये |