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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४


वह जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्' होता है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

| तं पादं तथैवोपास्ते यः स आयतनवानाश्रयवानस्मिँल्लोके भवति । तथायतनवत एव सावकाशाँल्लोकान्मृतो जयति । य एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | उस पादकी जो उसी प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्'—आश्रयवाला होता है तथा मरनेपर आयतनवान्—अवकाशयुक्त लोकोंको ही जीतता है । 'य एतमेवम्' इत्यादि वाक्य का अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥

नवम खण्ड

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सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना

स एवं ब्रह्मवित्सन्—इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर—

प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥

आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ १ ॥


आप ह प्राप्तवानाचार्यकुलम् । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति । भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥

'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया है ?' ऐसा [आचार्यने पूछा] तब उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें' ॥ २ ॥

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि । <br><br> प्रसन्नेन्द्रियः प्रहसितवदनश्च'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है।' कृतार्थ ब्रह्मवेत्ता ही प्रसन्नेन्द्रिय, हास्ययुक्त मुख-