छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| एव यज्ञ इत्यर्थः । तथा हि सामान्यैः संपादयति यज्ञत्वम् । कथम् ? तस्य पुरुषस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाण्यायुषस्तत्प्रातःसवनं पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य । | ही यज्ञ है । अब श्रुति सदृशता दिखलाकर पुरुषकी यज्ञरूपता सिद्ध करती है । किस प्रकार ? (सो बतलाते हैं—) उस पुरुषकी आयुके जो चौबीस वर्ष हैं, वे उस पुरुषसंज्ञक यज्ञके प्रातःसवन हैं । |
| केन सामान्येन ? इत्याह—चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री छन्दो गायत्रं गायत्रीछन्दस्कं हि विधियज्ञस्य प्रातःसवनम् । अतः प्रातःसवनसंपन्नेन चतुर्विंशतिवर्षायुषा युक्तः पुरुषः अतो विधियज्ञसादृश्याद्यज्ञः । तथोत्तरयोरप्यायुषोः सवनद्वयसंपत्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यक्षरसंख्यासामान्यतो वाच्या । | वे किस समताके कारण प्रातःसवन हैं ? सो बतलाते हैं—गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंवाला है और विधियज्ञका प्रातःसवन भी गायत्र—गायत्रीछन्दवाला है । अतः पुरुष प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई चौबीस वर्षकी आयुसे युक्त है । इसीसे विधियज्ञसे सदृशता होनेके कारण वह यज्ञ है । इसी प्रकार पीछेकी दोनों आयुओंसे त्रिष्टुप् और जगती छन्दके अक्षरोंकी संख्यामें समानता होनेके कारण उनके द्वारा अन्य दोनों सवनोंकी निष्पत्ति बतलानी चाहिये । |
| किं च तदस्य पुरुषयज्ञस्य प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो देवा अन्वायत्ता अनुगताः, सवनदेवतात्वेन स्वामिन इत्यर्थः। पुरुषयज्ञेऽपि विधियज्ञ इवाग्न्यादयो वसवो देवाः प्राणा इत्यतो | तथा विधियज्ञके समान इस पुरुषयज्ञके प्रातःसवनके भी वसु देवता अनुगत हैं । तात्पर्य यह है कि सवनदेवतारूपसे वे उसके स्वामी हैं । [इस कथनसे] विधियज्ञके समान पुरुषयज्ञमें भी अग्नि आदि ही वसुदेवता निश्चित होते हैं; अतः |
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५
| विशिनष्टि । प्राणा वाव वसवो वागादयो वायवश्च; ते हि यस्मादिदं पुरुषादिप्राणिजातमेते वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा; इत्यतो वसनाद्वासनाच्च वसवः ॥१॥ | श्रुति उनकी विशेषता ( विभिन्नता ) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं । देहमें प्राणोंके रहते हुए ही यह सब बसा हुआ है, और किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण प्राण वसु हैं ॥ १ ॥ |
<br>तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा
वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳसवनमनुसंतनु-
तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्यु-
द्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥
यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे कोई रोग आदि कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २ ॥
| तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रातःसवनसंपन्ने वयसि किञ्चिद्गदाध्यादि मरणशङ्काकारणमुपतपेद्दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी | उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयुमें मरणकी शङ्काकी कारणभूत कोई व्याधि आदि कष्ट पहुँचावे तो वह यज्ञसम्पादन करनेवाला पुरुष |