सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधꣳ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाःसोम block-ान्वनुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रꣳ संपदुः ॥५॥

उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नहीं कर सकता। अतः हे सोम्य ! तू समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन कर दूँगा; क्योंकि तूने सत्यका त्याग नहीं किया।' तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे जा।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र गायें हुए बिना मैं नहीं लौटूँगा' जब तक कि वे एक सहस्र हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमें ही रहा ॥ ५ ॥

| तं होवाच गौतमो नैतदृचोऽब्राह्मणो विशेषेण वक्तुमर्हत्यार्जवार्थसंयुक्तम्। ऋजवो हि ब्राह्मणा नेतरे स्वभावतः। यस्मान्न सत्याद्ब्राह्मणजातिधर्मादगा नापेतवानसि, अतो ब्राह्मणं त्वामुपनेष्येऽतः संस्कारार्थं होमाय समिधं सोम्याहरेत्युक्त्वा तमुपनीय कृशानामबलानां गो- | उससे गौतमने कहा—'ऐसा सरलार्थयुक्त वचन विशेषतः कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता, क्योंकि ब्राह्मण तो स्वभावतः ही सरल होते हैं, और लोग नहीं। क्योंकि तू ब्राह्मणजातिके धर्म सत्यसे विचलित अर्थात् भ्रष्ट नहीं हुआ, अतः मैं तुझ ब्राह्मणका उपनयन-संस्कार करूँगा। इसलिये हे सोम्य ! संस्कारार्थ होम करनेके लिये तू समिध ले आ।' ऐसा कह उसका उपनयन करनेके अनन्तर उसने गौओंके यूथमेंसे |

खण्ड ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ
संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
यूथान्निराकृत्यापकृष्य चतुः-शता चत्वारि शतानि गवा-मुवाचेमा गाः सोम्यानुसंव्रजा-नुगच्छ ।<br><br>इत्युक्तस्ता अरण्यं प्रत्यभि-प्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणा-पूर्णेन सहस्रेण नावर्तेय न प्रत्यागच्छेयम् । स एवमुक्त्वा गा अरण्यं तृणोदकबहुलं द्वन्द्व-रहितं प्रवेश्य स ह वर्षगणं दीर्घं प्रोवास प्रोषितवान् । ताः सम्यग्गावो रक्षिता यदा यस्मि-न्काले सहस्रं संपेदुः संपन्ना बभूवुः ॥ ५ ॥चार सौ कृश और निर्बल गौएँ अलग निकालकर उससे कहा—'हे सोम्य ! तू इन गौओंका अनुगमन कर—इनके पीछे-पीछे जा ।'<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर उन्हें वनकी ओर हाँकते हुए सत्यकामने कहा—'बिना एक सहस्र हुए अर्थात् इनकी एक सहस्र संख्या पूरी हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा ।' ऐसा कह वह उन गौओंको एक वनमें, जिसमें कि तृण और जलकी अधिकता थी तथा जो सर्वथा द्वन्द्व-रहित था, ले गया और वर्षोंतक—बहुत कालपर्यन्त, जबतक कि सम्यक् प्रकारसे रक्षा की हुई वे गौएँ एक सहस्र हुईं, वहीं रहा ॥ ५ ॥
<div align="center">

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

</div>

पञ्चम खण्ड

—: o :—

वृषभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश

| तमेतं श्रद्धातपोभ्यां सिद्धं वायुदेवता दिक्सम्बन्धिनी तुष्टा सत्यृषभमनुप्रविश्यर्षभभावमापन्नानुग्रहाय । | श्रद्धा और तपसे सिद्ध हुए उस इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी वायुदेवता संतुष्ट होकर ऋषभ ( साँड ) में अनुप्रविष्ट हुई अर्थात् उसपर कृपा करनेके लिये ऋषभभावको प्राप्त हुई । |

अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रꣳ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥

तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला— ] 'हे सोम्य ! हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥ १ ॥

| अथ हैनमृषभोऽभ्युवादा- <br> भ्युक्तवान्सत्यकाम ३ इति <br> संबोध्य, तमंसौ सत्यकामो <br> भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- <br> वचनं ददौ । प्राप्ताः सोम्य <br> सहस्रं स्मः, पूर्णा तव प्रतिज्ञा, <br> अतः प्रापय नोऽस्मानाचार्य- <br> कुलम् ॥ १ ॥ | तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' <br> इस प्रकार सम्बोधन करते हुए <br> कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' <br> ऐसा कहकर प्रतिवचन—प्रत्युत्तर <br> दिया । [साँडने कहा—] 'हे सोम्य ! <br> हम एक सहस्र हो गये हैं, तेरी <br> प्रतिज्ञा पूरी हो गयी; अतः अब तू <br> हमें आचार्यकुलमें पहुँचा दे' ॥१॥ |

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८७


किं च—तथा—

ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवा-
निति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला
दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः
पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥

‘[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?’ तब [ सत्यकामने ] कहा—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ साँड उससे बोला—‘पूर्व दिक्कला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे सोम्य ! यह ब्रह्मका ‘प्रकाशवान्’ नामक चार कलाओंवाला पाद है’ ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
अहं ब्रह्मणः परस्य ते तुभ्यं पादं ब्रवाणि कथयानि ? इत्युक्तः प्रत्युवाच—ब्रवीतु कथयतु मे मह्यं भगवान् । इत्युक्त ऋषभस्तस्मै सत्यकामाय होवाच—प्राची दिक्कला ब्रह्मणः पादस्य चतुर्थो भागः तथा प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य ब्रह्मणः पादश्चतुष्कलश्चतस्रः कला अवयवा यस्य सोऽयं चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम प्रकाशवानित्येव नामाभिधानं यस्य । तथोत्तरेऽपि पादास्त्रयश्चतुष्कला ब्रह्मणः ॥२॥‘[ क्या ] मैं तुझसे परब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ—कहूँ ?’ ऐसा कहे जानेपर सत्यकामने उत्तर दिया—‘भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें ।’ इस प्रकार कहे जानेपर साँडने उस सत्यकामसे कहा—‘पूर्व दिक्कला उस ब्रह्मके पादका चौथा भाग है । इसी प्रकार पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला है—हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कलपाद है—जिसमें चार कलाएँ अवयव हैं ऐसा यह ब्रह्मका प्रकाशवान् नामका अर्थात् ‘प्रकाशवान्’ यही जिसका नाम है [ ऐसा एक पाद है ] । इसी प्रकार ब्रह्मके आगेके तीन पाद भी चार कलाओंवाले ही हैं’ ॥ २ ॥

छा० उ० १३—