छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
३६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
और] हे भगवन्! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं॥ २ ॥
| हे रैक गवां षट् शतानीमानि तुभ्यं मयानीतानि, अयं निष्कोऽश्वतरीरथश्चायमेतद्धनमादत्स्व, भगवोऽनुशाधि च मे मामेताम्, यां च देवतां त्वमुपास्से तद्देवतोपदेशेन मामनुशाधीत्यर्थः ॥२॥ | हे रैक्व! मैं आपके लिये ये छः सौ गौएँ लाया हूँ तथा यह हार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ भी लाया हूँ, इस धनको ले लीजिये और हे भगवन्! मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये जिसकी आप उपासना करते हैं; अर्थात् उस देवताका उपदेश करनेके द्वारा मेरा अनुशासन कीजिये ॥ २ ॥ |
तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति। तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥
उस राजासे दूसरे [अर्थात् रैक्व] ने कहा—'ऐ शूद्र! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया ॥ ३ ॥
| तमेवमुक्तवन्तं राजानं प्रत्युवाच परो रैकः; अहेत्ययं निपातो विनिग्रहार्थी योऽन्यत्रेह त्वनर्थकः, एवशब्दस्य पृथक्प्रयोगात्। हारेत्वा हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री | इस प्रकार कहते हुए उस राजासे उस द्वितीय व्यक्ति—रैक्वने कहा—'अह' यह निपात दूसरी जगह 'विनिग्रह' अर्थमें प्रयुक्त होता है, किंतु यहाँ 'एव' शब्दका पृथक् प्रयोग रहनेके कारण निरर्थक है। हारसे युक्त जो इत्वा—गाड़ी |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सेयं हारेत्वा गोभिः सह तवैवास्तु तवैव तिष्ठतु, न ममापर्याप्तेन कर्मार्थमनेन प्रयोजनमित्यभिप्रायः, हे शूद्रेति । | उसे 'हारेत्वा' कहते हैं, वह यह गौओंके सहित 'हारेत्वा' तेरा ही रहे। तात्पर्य यह है कि हे शूद्र ! जो कर्मके लिये अपर्याप्त है ऐसे इस धनसे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। |
| ननु राजासौ क्षत्तृसम्बन्धात्स ह क्षत्तारमुवाचेत्युक्तम् । विद्याग्रहणाय च ब्राह्मणसमीपोपगमाच्छूद्रस्य चानधिकारात्कथमिदमननुरूपं रैक्वेणोच्यते हे शूद्रेति ? | शङ्का-क्षत्ता (सेवक) से सम्बन्ध होनेके कारण यह जानश्रुति तो राजा है, क्योंकि 'स ह क्षत्तारमुवाच' (उसने सेवकसे कहा) ऐसा पहले कहा जा चुका है। तथा शूद्रका अधिकार न होनेसे ब्राह्मणके समीप विद्याग्रहणके लिये जानेके कारण भी [ यह क्षत्रिय ही जान पड़ता है ] फिर रैक्वने 'हे शूद्र' ऐसा अनुचित शब्द क्यों कहा ? |
| तत्राहुराचार्याः—हंसवचनश्रवणाच्छुगेनमाविवेश; तेनासौ शुचा, श्रुत्वा रैक्वस्य महिमानं वा आद्रवतीति ऋषिरात्मनः परोक्षज्ञतां दर्शयंञ्छूद्रेत्याहेति। शूद्रवद्वा धनेनैवैनं विद्याग्रहणायोपजगाम | समाधान-इस विषयमें आचार्यगण ऐसा कहते हैं कि हंसका वचन सुननेपर इस जानश्रुतिमें शोकका आवेश हो गया था। उस शोकसे अथवा रैक्वकी महिमा सुनकर वह द्रवीभूत हो रहा था; इसलिये ऋषिने अपनी परोक्षज्ञता प्रदर्शित करनेके लिये उसे 'शूद्र' कहकर सम्बोधित किया। अथवा वह शूद्रके समान केवल धनके द्वारा ही विद्या ग्रहण करनेके लिये उसके समीप गया था, शुश्रूषाद्वारा ग्रहण करने नहीं गया |