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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| दृश्यते हि लोके ज्वरादि-रोगग्रस्तानां तद्विनिर्मोके स्वात्मस्थानां विश्रमणं तद्वदिहापि स्यादिति युक्तम्। "तद्यथा श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः" (बृ० उ० ४।३।१९) इत्यादिश्रुतेश्च ॥ १ ॥ | लोकमें ज्वरादि रोगोंसे ग्रस्त हुए पुरुषोंको उनसे छुटकारा मिलनेपर स्वस्थ होकर विश्राम करते देखा भी जाता ही है; उसी प्रकार यहाँ भी हो सकता है, अतः यह प्रसिद्धि ठीक ही है। यही बात "जिस प्रकार बाज अथवा कोई दूसरा पक्षी सब ओर उड़कर थक जानेपर" इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होती है॥१॥ |

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तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽर्थे—उस उपर्युक्त अर्थमें यह दृष्टान्त है—

स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनꣳहि सोम्य मन इति ॥२॥

जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है इसी प्रकार निश्चय ही हे सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि हे सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ २ ॥

स यथा शकुनिः पक्षी शकुनिघातकस्य हस्तगतेन सूत्रेण प्रबद्धः पाशितो दिशं दिशंजिस प्रकार चिड़ीमारके हाथमें पकड़ी हुई डोरीसे बँधा हुआ— उसमें फँसाया हुआ पक्षी उस बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छासे

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


| बन्धनमोक्षार्थी सन्प्रतिदिशं पतित्वान्यत्र बन्धनादायतनमाश्रयं विश्रमणायालब्ध्वाप्राप्य बन्धनमेवोपश्रयते । एवमेव यथायं दृष्टान्तः—खलु हे सोम्य तन्मनस्तत्प्रकृतं षोडशकलमन्नोपचितं मनो निर्धारितम्, तत्प्रविष्टस्तत्स्थस्तदुपलक्षितो जीवस्तन्मन इति निर्दिश्यते । मञ्चाक्रोशनवत्स मनआख्योपाधिर्जीवोऽविद्याकामकर्मोपदिष्टं दिशं दिशं सुखदुःखादिलक्षणां जाग्रत्स्वप्नयोः पतित्वा गत्वानुभूयेत्यर्थः, अन्यत्र सदाख्यात्स्वात्मन आयतनं विश्रमणस्थानमलब्ध्वा प्राणमेव, प्राणेन सर्वकार्यकरणाश्रयेणोपलक्षिता प्राण इत्युच्यते सदाख्या परा देवता, | दिशा-विदिशाओंमें उड़कर विश्राम करनेके लिये बन्धनके सिवा कोई और आयतन--आश्रय न पानेपर बन्धनस्थानका ही अवलम्ब लेता है; उसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे सोम्य ! निश्चय ही वह मन — वह सोलह कलाओंवाला प्रकृत मन जो कि अन्नसे उपचित हुआ निश्चय किया गया है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीमें स्थित हो, उसके ही द्वारा उपलक्षित होनेवाले जीवका ही वहाँ 'तन्मनः' ( वह मन ) इस कथनके द्वारा निर्देश किया गया है। मञ्चके आक्रोश (बोलने)* की भाँति वह मनसंज्ञक उपाधिवाला जीव जाग्रत् और स्वप्नके समय अविद्या, कामना और कर्मद्वारा उपदिष्ट सुख-दुःखादिरूप दिशा-विदिशामें उड़कर—जाकर अर्थात् उन्हें अनुभव कर अपने सत्-संज्ञक स्वात्मासे अतिरिक्त और कहीं आश्रय—विश्रामस्थान न पाकर प्राणको ही सम्पूर्ण कार्य और करणके आश्रयभूत प्राणद्वारा उपलक्षित हुआ सत्-संज्ञिका परादेवता यहाँ |


* जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च बोलते हैं ) इस वाक्यमें 'मञ्च' शब्दसे उसपर बैठे हुए लोगोंका ग्रहण होता है उसी प्रकार यहाँ 'मन' शब्दसे मनमें स्थित—मनरूप उपाधिवाला जीव उपलक्षित होता है ।