छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| [उक्ताक्षेप-निरासः] <br> न, आरब्धसंस्कारशेषस्थित्यर्थपरत्वात्, न कालान्तरितार्थता; अन्यथा तत्त्वमसीत्येतस्यार्थस्य बाधप्रसङ्गात् । यद्यप्यात्मशब्दस्य प्रत्यगर्थत्वं सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति च प्रकृतम्, एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मेत्युच्यते; तथाप्यन्तर्धानमीषदपरित्यज्यैवैतमात्मानमितोऽस्माच्छरीरात्प्रेत्याभिसंभवितास्मीत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह वचन प्रारब्धकर्म-जनित संस्कारोंकी समाप्तिपर्यन्त ही जीवकी स्थिति बतलानेके लिये है, इसका तात्पर्य कालका व्यवधान प्रदर्शित करनेमें नहीं है; नहीं तो 'तू वह है' इस वाक्यके अर्थके बाध होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा*। यद्यपि यहाँ 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्माका बोधक है, और 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है' इस वाक्यसे ब्रह्मका भी प्रकरण है तथा 'यह मेरा आत्मा हृदयके भीतर है—यह ब्रह्म है' ऐसा भी कहा गया है; तथापि 'थोड़ा-सा भी व्यवधान न छोड़कर मैं मरनेपर इस शरीरसे जाकर इसे प्राप्त होऊँगा'—ऐसा साधकका निश्चय बताया गया है। |
| यथाक्रतुरूपस्यात्मनः प्रतिपत्तास्मीति यस्यैवंविदः स्याद्ध्वेदद्धा सत्यमेवं स्यामहं प्रेत्यैवं न | इस प्रकार जाननेवाले जिस विद्वान्को 'मैं अपने निश्चयके अनुरूप सगुण परमात्माको प्राप्त होनेवाला हूँ, मैं अवश्य. वैसा ही हो |
* इसमें ब्रह्म और आत्माके अभेदका वर्तमानकालिक क्रियापदसे प्रतिपादन किया गया है; अतः कालभेद स्वीकार करनेसे इसके अभिप्रायसे विरोध उपस्थित होगा ।
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
| स्यामिति न च विचिकित्सास्ति, इत्येतस्मिन्नर्थे क्रतुफलसंबन्धे; स तथैवेश्वरभावं प्रतिपद्यते विद्वानित्येतदाह स्मोक्तवान्किल शाण्डिल्यो नामर्षिः । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ४ ॥ | जाऊँगा' ऐसा निश्चय है; और जिसे 'मैं ऐसा नहीं होऊँगा' ऐसी अपने निश्चयके फलके सम्बन्धमें शङ्का नहीं है, वह विद्वान् उसी प्रकार ईश्वर-भावको प्राप्त हो जाता है—ऐसा शाण्डिल्य नामक ऋषिने कहा है । 'शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छाान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥
पञ्चदश खण्ड
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विराट्कोशोपासना
| 'अस्य कुले वीरो जायते'<br><br>इत्युक्तम् । न वीरजन्ममात्रं<br><br>पितुस्त्राणाय; “तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं<br><br>लोक्यमाहुः” इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अतस्तद्दीर्घायुष्ट्वं कथं स्यादित्येव-<br><br>मर्थं कोशविज्ञानारम्भः । अभ्य-<br><br>र्हितविज्ञानव्यासङ्गादनन्तरमेव<br><br>नोक्तं तदिदानीमेवारभ्यते— | 'इसके कुलमें वीर पुत्र होता है'—ऐसा ( ३ । १३ । ६ में ) कहा गया है । किंतु वीर पुत्रका जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका कारण नहीं हो सकता; जैसा कि “अतः अनुशासित पुत्रको [ ब्राह्मणलोग ] लोक्य [ पुण्यलोक प्राप्त करानेवाला ] कहते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः उसे दीर्घायुष्ट्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है—इसीके लिये कोशविज्ञानका आरम्भ किया जाता है । अभ्यर्हित* उपासनाके प्रतिपादनमें संलग्न रहनेके कारण 'वीरो जायते' इस श्रुतिके अनन्तर ही इसका वर्णन नहीं किया, इसलिये अब आरम्भ किया जाता है— |
* गायत्रीरूप उपाधिसे युक्त ब्रह्मकी उपासनाको कौक्षेय ज्योतिमें आरोपित करके परब्रह्मकी उपासना करना अभ्यर्हित है और उसकी मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट ब्रह्मोपासना अन्तरङ्ग है ।
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो
ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलꣳ स एष कोशो वसुधा-
नस्तस्मिन्विश्वमिदꣳ श्रितम् ॥ १ ॥
अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है वह यह कोश वसुधान है। उसीमें यह सारा विश्व स्थित है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अन्तरिक्षमुदरमन्तः सुषिरं यस्य सोऽयमन्तरिक्षोदरः, कोशः कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोशः स च भूमिबुध्नः, भूमिर्बुध्नो मूलं यस्य स भूमिबुध्नः, न जीर्यति न विनश्यति, त्रैलोक्यात्मकत्वात् । सहस्रयुगकालावस्थायी हि सः । | अन्तरिक्ष है उदर—अन्तःछिद्र जिसका वह यह अन्तरिक्षोदर कोश जो अनेक धर्मोंमें सादृश्य रखनेके कारण कोशके समान कोश है, वह भूमिबुध्न–भूमि है बुध्न–मूल जिसका ऐसा भूमिबुध्न (पृथ्वीमूलक) है, वह त्रैलोक्यरूप होनेके कारण जीर्ण नहीं होता अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होता। क्योंकि वह तो सहस्रयुगकालपर्यन्त रहनेवाला है। |
| दिशो ह्यस्य सर्वाः स्रक्तयः कोणाः । द्यौरस्य कोशस्योत्तरमूर्ध्वं बिलम्, स एष यथोक्तगुणः कोशो वसुधानः, वसु धीयतेऽस्मिन्प्राणिनां कर्मफलाख्यमतो वसुधानः । तस्मिन्नन्तर्विश्वं समस्तं प्राणिकर्मफलं सह | समस्त दिशाएँ ही इसकी स्रक्तियाँ अर्थात् कोण हैं। द्युलोक इस कोशका ऊपरी छिद्र है। वह यह पूर्वोक्त गुणोंवाला कोश वसुधान है, इसमें प्राणियोंके कर्मफलसंज्ञक वसुका आधान किया जाता है, इसलिये यह कोश वसुधान है। तात्पर्य यह है कि उस कोशके भीतर ही प्राणियोंका सम्पूर्ण कर्मफल जिसका कि] |