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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

३१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


उससे अग्निने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥

| तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति संबोध्य, तमसो सत्यकामो भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रतिवचनं ददौ ॥ २ ॥ | उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा । उसे सत्यकामने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया ॥ २ ॥ |

—: ☸ :—

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥

'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकामने कहा— ] 'भगवान् मुझे [ अवश्य ] बतलावें।' तब उसने उससे कहा— 'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥३॥

| ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच— पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलेत्यात्मगोचरमेव दर्शनमग्निरब्रवीत् । एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ?' [सत्यकामने कहा—] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब उसने उससे कहा—'पृथिवी कला है, अन्तरिक्ष कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है'—इस प्रकार अग्निने अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका निरूपण किया—'हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चार कलाओंवाला पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं ३९१


स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽ-
नन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो
ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं
ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

| स यः कश्चिद्यथोक्तं पादम- <br><br> नन्तवत्त्वेन गुणेनोपास्ते स <br><br> तथैव तद्गुणो भवत्यस्मिँल्लोके <br><br> मृतश्चानन्तवतो ह लोकान्स <br><br> जयति य एतमेवमित्यादि <br><br> पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | वह, जो कोई पुरुष उपर्युक्त पाद-की अनन्तवत्त्वगुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें उसी प्रकार—उसी गुणवाला हो जाता है, तथा मरनेपर अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत है ॥ ४ ॥ |


इति च्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥

सप्तम खण्ड

—: ० :—

हंसद्वारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश

हꣳसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते सा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ तꣳहꣳस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥२॥

'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि निवृत्त हो गया]। दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा ॥ १ ॥ तब हंसने उसके समीप उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ २ ॥

| सोऽग्निर्हंसस्ते पादं वक्तेत्युक्त्वोपरराम । हंस आदित्यः, शौक्ल्यात्पतनसामान्याच्च । स ह श्वोभूत इत्यादि समानम् ॥ १-२ ॥ | वह अग्नि 'हंस तुझे तीसरा पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर उपरत हो गया। शुक्लता तथा उड़नेमें समानता होनेके कारण यहाँ आदित्यको हंस कहा गया है। 'स ह श्वोभूते' आदि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥१-२॥ |


ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥

खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९३


[ हंसने कहा— ] हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला— ] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब वह उससे बोला— 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है' ॥३॥

स च एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥

जो कोई इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युतकलैष वै सोम्येति ज्योतिर्विषयमेव च दर्शनं प्रोवाचातो हंसस्यादित्यत्वं प्रतीयते। विद्वत्फलम्—ज्योतिष्मान्दीप्तियुक्तोऽस्मिँल्लोके भवति । चन्द्रादित्यादीनां ज्योतिष्मत एव च मृत्वा लोकाञ्जयति; समानमुत्तरम् ॥ ३-४ ॥'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्र कला है, विद्युत कला है, हे सोम्य यह' इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योतिर्विषयक दर्शनका ही निरूपण किया है; इससे हंसका आदित्यत्व प्रतीत होता है । इस प्रकारके विद्वान्को प्राप्त होनेवाला फल—वह इस लोकमें ज्योतिष्मान्—दीप्तियुक्त होता है तथा मरनेपर चन्द्र एवं आदित्यादिके ज्योतिष्मान् लोकोंको ही जीत लेता है। आगेका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

अष्टम खण्ड


मद्गुद्वारा ब्रह्मके चतुर्थ पादका उपदेश

मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥

'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर हंस चला गया ]। दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर हाँक दिया। वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ॥ १ ॥

| हंसोऽपि मद्गुष्टे पादं वक्ते-<br><br>त्युपरराम । मद्गुरुदकचरः पक्षी<br><br>स चाप्सम्बन्धात्प्राणः । स ह<br><br>श्वोभूत इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | हंस भी 'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा कहकर चला गया। 'मद्गु' जलचर पक्षीको कहते हैं; जलसे सम्बन्ध होनेके कारण वह प्राण ही है। 'स ह श्वोभूते' इत्यादि वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् है ॥ १ ॥ |

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तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥

मद्गुने उसके पास उतरकर कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया 'भगवन् !' ॥ २ ॥

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५


ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलाः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥

[ मद्गु बोला—] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला—] 'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब वह उससे बोला— 'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है और मन कला है । हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'आयतनवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥

| स च मद्गुः प्राणः स्वविषयमेव च दर्शनमुवाच प्राणः कलेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम । आयतनं नाम मनः सर्वकरणोपहृतानां भोगानां तद्यस्मिन्पादे विद्यत इत्यायतनवान्नाम पादः ॥ २-३ ॥ | उस मद्गु यानी प्राणने भी 'प्राण कला है' इत्यादि 'आयतनवान्' इस नामवाला पाद है, ऐसा कहकर अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका ही निरूपण किया । समस्त इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए भोगोंका आयतन मन ही है, वह जिस पादमें विद्यमान है वह पाद 'आयतनवान्' नामवाला है ॥ २–३ ॥ |

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स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥