छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| द्युवंशे लग्नः सँल्लम्बत इवातो मध्वपूपसामान्यादन्तरिक्षं मध्वपूपो मधुनः सवितुराश्रयत्वाच्च।<br><br>मरीचयो रश्मयो रश्मिस्था आपो भौमाः सवित्राकृष्टाः “एता वा आपः स्वराजो यन्मरीचयः” इति हि विज्ञायन्ते। ता अन्तरिक्षमध्वपूपस्थरश्म्यन्तर्गतत्वाद भ्रमरबीजभूताः पुत्रा इव हिता लक्ष्यन्त इति पुत्रा इव पुत्रा मध्वपूपनाड्यन्तर्गता हि भ्रमरपुत्राः ॥ १ ॥ | मानो लटकता है, अतः मधुके छत्तेके समान होनेके कारण तथा मधुरूप सूर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष-लोक ही मधुका छत्ता है।<br><br>मरीचि—किरणें अर्थात् सूर्यद्वारा खींचा हुआ उसकी किरणोंमें स्थित पार्थिव जल—जिसका कि “स्वराट् (स्वयं प्रकाश सूर्य) की जो किरणें हैं वे निश्चय ही जल हैं” इस श्रुतिद्वारा ज्ञान होता है, वह अन्तरिक्षरूप शहदके छत्तेमें स्थित किरणोंके अन्तर्गत होनेके कारण मधुकरोंके बीजभूत पुत्रों (मधुमक्खियोंके बच्चों) के समान उनमें निहित दिखायी देता है। अतः वह सूर्यरश्मिस्थ जल भ्रमरपुत्रोंके समान पुत्ररूप है, क्योंकि छत्तेके छिद्रोंमें ही भ्रमरपुत्र रहा करते हैं ॥ १ ॥ |
आदित्यकी पूर्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः। ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः॥ २ ॥ एतमृग्वेदम्-अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना-द्यँरसोऽजायत ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणें हैं, वे ही इस (अन्तरिक्ष-रूप छत्ते) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र हैं। ऋक् ही मधुकर हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, वे सोम आदि अमृत ही जल हैं। उन इन ऋक् [रूप मधुकरों] ने ही इस ऋग्वेदका अभिताप किया। उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥
| तस्य सवितुर्मध्वाश्रयस्य मधुनो ये प्राञ्चः प्राच्यां दिशि-गता रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यः प्रागञ्चनान्मधुनो नाड्यो मधु-नाड्य इव मध्वाधारच्छिद्रा-णीत्यर्थः । <br><br> तत्र ऋच एव मधुकृतो लोहितरूपं सवित्राश्रयं मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो भ्रमरा इव । यतो रसानादाय मधु कुर्वन्ति तत्पुष्पमिव पुष्पमृ-ग्वेद एव । <br><br> तत्र ऋग्ब्राह्मणसमुदायस्यर्त्वे-दाख्यत्वाच्छब्दमात्राच्च भोग्य-रूपरसनिस्त्रावासंभवादृग्वेदशब्दे-नात्र ऋग्वेदविहितं कर्म । ततो हि कर्मफलभूतमधुरसनिस्त्राव-संभवात् । मधुकरैरिव पुष्प- | मधुके आश्रयभूत उस सूर्यरूप मधुकी जो पूर्वदिशागत किरणें हैं वे ही पूर्वकी ओर जानेके कारण इसकी पूर्व मधुनाडियाँ हैं। मधुकी नाडियोंके समान मधुनाडियाँ हैं अर्थात् वे मधुके आधारभूत छिद्र हैं। <br><br> तहाँ ऋचाएँ ही मधुकर हैं, वे सूर्यमें रहनेवाला लोहितरूप मधु उत्पन्न करती हैं, अतः भ्रमरोंके समान वे ही मधुकर हैं। जिससे रसोंको ग्रहण करके वे मधु करती हैं वह ऋग्वेद ही पुष्पके समान पुष्प है। <br><br> किंतु यहाँ ऋग्ब्राह्मणसमुदायका ही नाम ऋग्वेद है और केवल शब्द-से ही भोग्यरूप रसका निकलना असम्भव है; अतः 'ऋग्वेद' शब्दसे यहाँ ऋग्वेदविहित कर्म अभिप्रेत है, क्योंकि उसीसे कर्मफलभूत मधुरूप रसका निकलना सम्भव है। मधुकरोंके समान उस पुष्प |