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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

२१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

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२१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनꣳस्पर्शोषूपालभेत मृत्युँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥

और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था, वही तेरा मर्दन करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे दग्ध करेगा' ॥ ४ ॥

| अथ यद्येनमूष्मसु तथैवोपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति पेक्ष्यति संचूर्णयिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति धक्ष्यति भस्मीकरिष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ | और यदि उसी प्रकार कोई पुरुष इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे पीसेगा अर्थात् [तेरे मदको] अच्छी तरह चूर्ण करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युके शरणागत था, वही तुझे दग्ध यानी भस्मीभूत करेगा' ॥४॥ |

वर्णोंके उच्चारणकालमें चिन्तनीय

सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशोनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण किये जाने चाहिये; अतः [ उनका उच्चारण करते समय ] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ'

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खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३

ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एवं विवृतरूपसे उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ'। समस्त स्पर्शवर्णोंको एक दूसरेसे तनिक भी मिलाये बिना ही बोलना चाहिये और उस समय 'मैं मृत्युसे अपना परिहार करूँ' [ऐसा चिन्तन करना चाहिये॥ ५॥

| यत इन्द्राद्यात्मानः स्वरादयोऽतः सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्याः । तथाहमिन्द्रे बलं ददानि बलमादधानीति । तथा सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अन्तरप्रवेशिता अनिरस्ता बहिरप्रक्षिप्ता विवृता विवृतप्रयत्नोपेताः प्रजापतेरात्मानं परिददानि प्रयच्छानीति । सर्वे स्पर्शा लेशेन शनकैरनभिनिहिता अनभिनिक्षिप्ता वक्तव्या मृत्योरात्मानं बालानिव शनकैः परिहरद्भिर्मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥५॥ | क्योंकि ये स्वरादि इन्द्रादिरूप हैं, अतः सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त बोले जाने चाहिये। तथा [उस समय] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। इसी प्रकार समस्त ऊष्म-वर्ण अग्रस्त—भीतर बिना प्रवेश कराये हुए, अनिरस्त—बाहर बिना निकाले हुए, और विवृत—विवृत¹ प्रयत्नसे युक्त उच्चारण किये जाने चाहिये और [उनका उच्चारण करते समय] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। तथा सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण लेशमात्र—थोड़े-से भी अनभिनिहित-परस्पर बिना मिले हुए बोलने चाहिये और [उस समय यह चिन्तन करना चाहिये कि] जिस प्रकार लोग धीरे-धीरे बालकोंको जल आदि-से बचाते हैं उसी प्रकार मैं अपनेको धीरे-धीरे मृत्युसे हटाऊँ ॥ ५ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥
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१. वर्णोंके स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत ये चार प्रयत्न होते हैं। इसमें स्वर और ऊष्मोंका विवृत, स्पर्शोंका स्पृष्ट, अन्तःस्थोंका ईषत्स्पृष्ट और ह्रस्व अवर्णका संवृत प्रयत्न होता है।

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त्रयोविंश खण्ड


तीन धर्मस्कन्ध

ओङ्कारस्योपासनविध्यर्थं त्रयो धर्मस्कन्धा इत्याद्यारभ्यते । नैवं मन्तव्यं सामावयवभूतस्यैवोद्गीथादिलक्षणस्योङ्कारस्योपासनात्फलं प्राप्यत इति । किं तर्हि ? यत्सर्वैरपि सामोपासनैः कर्मभिश्चाप्राप्यं तत्फलममृतत्वं केवलादोङ्कारोपासनात्प्राप्यत इति । तत्स्तुत्यर्थं सामप्रकरणे तदुपन्यासः—ओङ्कारोपासनाका विधान करनेके लिये 'त्रयो धर्मस्कन्धाः' इत्यादि प्रकरणका आरम्भ किया जाता है । ऐसा नहीं मानना चाहिये कि एकमात्र सामके अवयवभूत उद्गीथादिरूप ओङ्कारकी ही उपासनासे फलकी प्राप्ति होती है । तो फिर क्या बात है ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—] जो सभी सामोपासनाओं और कर्मोंसे भी अप्राप्य है, वह अमृतत्वरूप फल केवल ओङ्कारोपासनासे ही प्राप्त हो जाता है । अतः उसकी स्तुतिके लिये सामोपासनाके प्रकरणमें उसका उल्लेख किया जाता है—

त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥

धर्मके तीन स्कन्ध (आधारस्तम्भ) हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें रहनेवाला

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खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५


ब्रह्मचारी जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं। ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी संन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयस्त्रिसंख्याका धर्मस्य स्कन्धा धर्मस्कन्धा धर्मप्रविभागा इत्यर्थः । के ते ? इत्याह—यज्ञोऽग्निहोत्रादिः । अध्ययनं सनियमस्य ऋगादेरभ्यासः । दानं बहिर्वेदि यथाशक्तिद्रव्यसंविभागो भिक्षमाणेभ्यः । इत्येष प्रथमो धर्मस्कन्धः । गृहस्थसमवेतत्वान्निर्वर्तकेन गृहस्थेन निर्दिश्यते । प्रथम एक इत्यर्थो द्वितीयतृतीयश्रवणान्नाद्यार्थः ।धर्मस्कन्ध—धर्मके स्कन्ध यानी धर्मके विभाग त्रयः अर्थात् तीन संख्यावाले हैं। वे कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं, यज्ञ—अग्निहोत्रादि, अध्ययन—नियमपूर्वक ऋग्वेदादिका अभ्यास और दान—वेदीके बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको यथाशक्ति धन देना—इस प्रकार यह पहला धर्मस्कन्ध है। यह धर्म गृहस्थधर्मसम्बन्धी होनेके कारण उसके साधक गृहस्थरूपसे उसका निर्देश किया जाता है। यहाँ 'प्रथम' शब्दका अर्थ एक है, श्रुतिमें 'द्वितीय, तृतीय' शब्द होनेसे इसका प्रयोग आद्य अर्थमें नहीं किया गया।
तप एव द्वितीयस्तप इति कृच्छ्रचान्द्रायणादि तद्वांस्तापसः परिव्राड् वा न ब्रह्मसंस्थ आश्रमधर्ममात्रसंस्थो ब्रह्मसंस्थस्य त्वमृतत्वश्रवणात् । द्वितीयो धर्मस्कन्धः ।तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है। 'तप' इस शब्दसे कृच्छ्रचान्द्रायणादि समझने चाहिये, उनसे युक्त तपस्वी या परिव्राजक, ब्रह्मनिष्ठ नहीं बल्कि जो केवल आश्रमधर्ममें ही स्थित है; क्योंकि श्रुतिने ब्रह्मनिष्ठके लिये तो अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी है। यह दूसरा धर्मस्कन्ध है ।