छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तुल्यां बुद्धिमुत्पादयति; अतः सर्वेण समोऽतः साम समत्वादित्यर्थः।<br><br>उद्गीथभक्तिसामान्यवचनादेव लोकादिषूक्तसामान्याद्धिंकारादित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे कारणं नोक्तम्। सामत्वे पुनः सवितुरनुक्तं कारणं न सुबोधमिति समत्वमुक्तम् ॥ १ ॥ | सबमें समान बुद्धि उत्पन्न करता है, [ क्योंकि उसे सभी प्राणी अपने-अपने सम्मुख देखते हैं ] इसलिये वह सबके साथ समान है; अतः इस समताके कारण वह साम है।<br><br>उद्गीथभक्तिमें समानता बतलानेसे ही [ अर्थात् उद्गीथके साथ आदित्यका ऊर्ध्वत्वमें सादृश्य है—ऐसा जो श्रुतिने कहा है उसके अनुसार ही ] लोकादिमें भी [ सामावयवोंके साथ ] सादृश्य बतलाये जानेसे उनका हिंकारादिरूप होना ज्ञात होता है—इसीसे [ श्रुतिमें आदित्यावयवोंके ] हिंकारादिरूप होनेमें कारण नहीं बतलाया गया था।* किंतु आदित्यकी सामरूपतामें न बतलाया गया कारण सुगमतासे नहीं जाना जा सकता इसलिये उसके सम्बन्धमें समत्वरूप कारण बतलाया गया है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिं कुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥
उस आदित्यमें ये सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने। जो उस आदित्यके उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है
* क्योंकि लोकादिके हिंकारादिरूप होनेमें जो-जो कारण हैं, वे ही आदित्यावयवोंके सम्बन्धमें भी समझे जा सकते हैं।
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५
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उसके पशु अनुगत हैं, इससे वे हिंकार करते हैं। अतः वे ही इस आदित्यरूप सामके हिंकारभाजन हैं ॥ २ ॥
| तस्मिन्नादित्येऽवयवविभागश इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तान्यनुगतान्यादित्यमुपजीव्यत्वेनेति विद्यात् । कथम् ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोदयाद्धर्मरूपम्, स हिंकारो भक्तिस्तत्रेदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारभक्तिरूपम् । | उस आदित्यमें ये आगे बतलाये जानेवाले समस्त भूत अवयवविभागानुसार उसके उपजीव्य रूपसे अन्वायत्त — अनुगत हैं—ऐसा जाने । वे किस प्रकार अनुगत हैं ? [ यह बतलाते हैं—] उस आदित्यका उदयसे पहले जो धर्मरूप ( धर्मानुष्ठानका प्रेरक स्वरूप) है वह हिंकारभक्ति है। उस धर्मरूपमें यही सादृश्य है कि वह उस ( आदित्यसंज्ञक साम ) का हिंकारभक्तिरूप है । |
| तदस्यादित्यस्य साम्नः पशवो गवाद्योऽन्वायत्ता अनुगतास्तद्भक्तिरूपमुपजीवन्तीत्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति पशवः प्रागुदयात् । तस्माद्धिंकारभाजिनो ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्भक्तिभजनशीलत्वाद्वि त एवं वर्तन्ते ॥ २ ॥ | उस इस आदित्यरूप सामके गौ आदि पशु अन्वायत्त—अनुगत हैं; अर्थात् उस हिंकारभक्तिरूपसे उसमें उपजीवी हैं । क्योंकि ऐसा है इसीलिये वे पशु सूर्योदयसे पूर्व हिंकार-शब्द करते हैं । अतः वे इस आदित्यसंज्ञक सामके हिंकारपात्र हैं । उस हिंकारभक्तिके सेवनमें तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार बर्ताव करते हैं [ अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व हिंकार करते हैं ] ॥ २ ॥ |
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अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः प्रशꣳसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥