छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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ॐ समस्त सामकी उपासना साधु है। जो साधु होता है उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है वह असाम कहलाता है ॥१॥
| समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य पाञ्चभक्तिकस्य सप्तभक्तिकस्य चेत्यर्थः। खल्विति वाक्यालंकारार्थः साम्न उपासनं साधु। समस्ते साम्नि साधुदृष्टिविधिपरत्वान्न पूर्वोपासननिन्दार्थत्वं साधुशब्दस्य। <br><br> ननु पूर्वत्राविद्यमानं साधुत्वं समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहारात्। साधुशब्दः शोभनवाची कथमवगम्यते ? इत्याह-यत्खलु लोके साधु शोभनमनवद्यं प्रसिद्धं तत्सामेत्याचक्षते कुशलाः। यदसाधु विपरीतं तदसामेति ॥ १ ॥ | समस्त अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त यानी पाञ्चभक्तिक और साप्तभक्तिक सामकी उपासना साधु है। 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है। समस्त साममें साधुदृष्टिका विधान करनेमें प्रवृत्त होनेके कारण साधु शब्द पूर्व उपासनाकी निन्दाके लिये नहीं है। <br><br> यदि कहो कि पूर्व उपासनामें न रहनेवाली ही साधुता समस्त साममें बतलायी जाती है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि [पूर्वोक्त उपासनाका] 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करे' ऐसा कहकर उपसंहार किया है। 'साधु' शब्द शोभन अर्थका बोधक है—यह कैसे जाना जाता है ? इसपर कहते हैं—लोकमें जो वस्तु साधु—शोभन अर्थात् निर्दोष-रूपसे प्रसिद्ध है उसको निपुणजन 'साम' ऐसा कहकर पुकारते हैं। तथा जो असाधु यानी विपरीत होती है, उसको असाम कहते हैं ॥१॥ |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१
तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥
इसी विषयमें कहते हैं—[ जब कहा जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास सामद्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] वह इसके पास असामद्वारा गया तो [ इससे ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ ॥ २ ॥
| तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेककरण उताप्याहुः । साम्नैनं राजानं सामन्तं चोपागादुपगतवान् । कोऽसौ ? यतोऽसाधुत्वप्राप्त्याशङ्का स इत्यभिप्रायः । शोभनाभिप्रायेण साधुनैनमुपागादित्येव तत्तत्राहुर्लौकिका बन्धनाद्यसाधुकार्यमपश्यन्तः । यत्र पुनर्विपर्ययो बन्धनाद्यसाधुकार्यं पश्यन्ति तत्रासाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥ | वहाँ—उस साधु-असाधुका विवेक करनेमें ही कहते हैं कि [ जब यह कहा जाता है कि ] इस राजा अथवा सामन्तके पास सामरूपसे गया—कौन गया ? जिससे कि असाधुत्वकी प्राप्तिकी आशङ्का थी वह—ऐसा इसका तात्पर्य है—तो उसके बन्धन आदि असाधु कार्योंके न देखनेवाले लौकिक पुरुष यही कहते हैं कि वह उस [ राजा या सामन्त ] के पास शोभन अभिप्रायसे साधुभावसे गया । और जहाँ इसके विपरीत बन्धन आदि असाधु-कार्य देखते हैं वहाँ वे ऐसा ही कहते हैं कि वह इसके पास असाम—असाधुरूपसे गया ॥२॥ |
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