संग्रह पर लौटें


छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
१४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
पृष्ठ 150स्थायी लिंक
| १४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| आदित्य ऊकारः। उच्चैरूर्ध्वं सन्तमादित्यं गायन्तीत्यूकारश्चायं स्तोभः। आदित्यदैवत्ये साम्नि स्तोभ ऊ इत्यादित्य ऊकारः। निहव इत्याह्वानमेकारः स्तोभः। एहीति चाह्वयन्तीति तत्सामान्यात्। विश्वे देवा औहोयिकारः। वैश्वदेव्ये साम्नि स्तोभस्य दर्शनात्। प्रजापतिर्हिंकारः। अनिरुक्तत्वाद्विंकारस्य चाव्यक्तत्वात्। | आदित्य ऊकार है; ऊँचा अर्थात् ऊपरकी ओर स्थित आदित्यका ही [उद्गाता लोग] गान करते हैं, अतः ऊकार ही यह स्तोभ है। आदित्य देवतासम्बन्धी साममें ऊ स्तोभ है, अतः आदित्य ऊकार है—[ ऐसी उपासना करे ]। निहव आह्वानको कहते हैं; वह एकार स्तोभ है, क्योंकि 'एहि' ऐसा कहकर लोग पुकारा करते हैं, उस सादृश्यके कारण [ निहव एकार है ]। विश्वेदेव औहोयिकार हैं, क्योंकि वैश्वदेव्य साममें यह स्तोभ देखा जाता है। प्रजापति हिंकार है, क्योंकि उसका किसी प्रकार निर्वचन नहीं किया जा सकता तथा हिंकार भी अव्यक्त ही है। |
| घ्राणः स्वरः, स्वर इति स्तोभः। घ्राणस्य च स्वरहेतुत्वसामान्यात्। अन्नं या। या इति स्तोभोऽन्नम्। अन्नेन हीदं यातीत्यतस्तत्सामान्यात्। वागिति स्तोभो विराडन्नं देवताविशेषो वा। वैराजे साम्नि स्तोभदर्शनात् ॥ २ ॥ | प्राण स्वर है; 'स्वर' यह एक प्रकारका स्तोभ है। स्वरका कारण होनेमें उससे प्राणकी सदृशता होनेके कारण [प्राण स्वर है]। अन्न या है। 'या' यह स्तोभ अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही यह प्राणी यात्रा करता है अतः उसकी समानता होनेके कारण अन्न या है। 'वाक्' यह स्तोभ विराट्—अन्न अथवा देवताविशेष है, क्योंकि वैराज साममें वाक् स्तोभ देखा जाता है॥२॥ |
—•—
पृष्ठ 151स्थायी लिंक
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्याथ [ १४७
अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥३॥
जिसका [ विशेषरूपसे ] निरूपण नहीं किया जाता और जो [ कार्यरूपसे ] संचार करनेवाला है वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है ॥ ३ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
|---|---|
| अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चेदं चेति निर्वक्तुं न शक्यत इत्यतः संचरो विकल्प्यमानस्वरूप इत्यर्थः। कोऽसौ ? इत्याह- त्रयोदशः स्तोभो हुंकारः। अव्यक्तो ह्ययमतोग्निरुक्तविशेष एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥ ३ ॥ | जो अव्यक्त होनेके कारण 'यह और यह' इस रूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त है और संचर अर्थात् विकल्प्यमानस्वरूप है, वह क्या है ? सो बतलाते हैं—वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है। वह अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविशेषरूपसे ही उपासनीय है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल
| स्तोभाक्षरोपासनाफलमाह— | अब स्तोभाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाते हैं— |
दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवꣳसाम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद ॥४॥
जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषद्को जानता है उसे वाणी, जो वाणीका फल है उस फलको देती है तथा वह अन्नवान् और अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
|---|---|
| दुग्धेऽस्मै वाग्दोहमित्याद्युक्तार्थम् । य एतामेवं यथोक्त- | 'दुग्धेऽस्मै वाग्दोहम्' इत्यादि-वाक्यका अर्थ पहले (छा० १।३।७ में) कहा जा चुका है। जो |