छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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हैं। वह यह प्राण-देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है, यदि तू उसे बिना जाने ही प्रस्तवन करता तो मेरेद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता' ॥ ५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पृष्टः प्राण इति होवाच। युक्तं प्रस्तावस्य प्राणो देवतेति। कथम् ? सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्रलयकाले प्राणमभि लक्षयित्वा प्राणात्मनैव, उज्जिहते प्राणादेवोद्गच्छन्तीत्यर्थ उत्पत्तिकाले। अतः सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता।<br><br>तां चेदविद्वांस्त्वं प्रास्तोष्यः प्रस्तवनं प्रस्तावभक्तिं कृतवानसि यदि मूर्धा शिरस्ते व्यपतिष्यद्विपतितमभविष्यत्तथोक्तस्य मया तत्काले मूर्धा ते विपतिष्यतीति। अतस्त्वया साधु कृतम्, मया निषिद्धः कर्मणो यदुपरममकार्षीरित्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता प्राण है' ऐसा कहा। प्राण प्रस्तावका देवता है—यह कथन ठीक ही है। किस प्रकार ? क्योंकि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी प्रलयकालमें प्राणहीमें प्रवेश करते हैं, अर्थात् प्राणकी ओर लक्ष्यकर प्राणरूपसे ही [ उसमें स्थित हो जाते हैं ] और उत्पत्तिकालमें उसीसे उद्गत होते हैं अर्थात् वे प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं। अतः वह यह प्राणदेवता ही प्रस्तावमें अनुगत है।<br><br>तू यदि उसे बिना जाने ही प्रस्तवन-प्रस्तावभक्ति करता तो तेरा मूर्द्धा यानी मस्तक गिर जाता। अर्थात् उस समय मेरे इस प्रकार कहनेपर कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा' तेरा मस्तक अवश्य गिर जाता। अतः अभिप्राय यह है कि तूने जो मेरे निषेध करनेपर कर्मसे उपरति की वह अच्छा ही किया है ॥ ५ ॥ |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५
उद्गाताका प्रश्न
अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥
तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! आपने मुझसे जो कहा था कि हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ६ ॥
| तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा सोद्गीथभक्तिमनुगतान्वायत्ता देवता ? इति ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी पूछा कि वह उद्गीथभक्तिमें अनुगत कौन देवता है ? ॥ ६ ॥ |
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उषस्तिका उत्तर-उद्गीथानुगत देवता आदित्य है
आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥
उषस्तिने 'वह ( देवता ) आदित्य है' ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैं । वह यह आदित्य देवता ही उद्गीथमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही उद्गान करता तो मेरे द्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ७ ॥
| पृष्ट आदित्य इति होवाच । | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह [ देवता ] आदित्य है' ऐसा |
| सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या- | कहा; क्योंकि ये सभी प्राणी ऊँचे |