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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

0582

$ॐ$

उपनिषद्-भाष्य

(सानुवाद)

खण्ड ३

छान्दोग्योपनिषद्

(सानुवाद शाङ्करभाष्य-सहित)

|||

गीताप्रेस, गोरखपुर

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582

ॐ

छान्दोग्योपनिषद्

( सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित )

गीताप्रेस, गोरखपुर

प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर



सं० १९९३ से २०५० तक३२,०००
सं० २०५२ आठवाँ संस्करण५,०००
योग३७,०००
<br>

मूल्य—पचास रुपये



मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
दूरभाष—३३४७२१

श्रीहरिः

प्रस्तावना

छान्दोग्योपनिषद् सामवेदीय तलवकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है। केनोपनिषद् भी तलवकारशाखाकी ही है। इसलिये इन दोनोंका एक ही शान्तिपाठ है। यह उपनिषद् बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसकी वर्णनशैली अत्यन्त क्रमबद्ध और युक्तियुक्त है। इसमें तत्त्वज्ञान और तदुपयोगी कर्म तथा उपासनाओंका बड़ा विशद और विस्तृत वर्णन है। यद्यपि आजकल औपनिषद कर्म और उपासनाका प्रायः सर्वथा लोप हो जानेके कारण उनके स्वरूप और रहस्यका यथावत् ज्ञान इने-गिने प्रकाण्ड पण्डित और विचारकोंको ही है, तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके मूलमें जो भाव और उद्देश्य निहित है उसीके आधारपर उनसे परवर्ती स्मार्त कर्म एवं पौराणिक और तान्त्रिक उपासनाओंका आविर्भाव हुआ है।

अद्वैतवेदान्तकी प्रक्रियाके अनुसार जीव अविद्याकी तीन शक्तियोंसे आवृत्त है, उन्हें मल, विक्षेप और आवरण कहते हैं। इनमें मल अर्थात् अन्तःकरणके मलिन संस्कारजनित दोषोंकी निवृत्ति निष्काम कर्मसे होती है, विक्षेप अर्थात् चित्तचाञ्चल्यका नाश उपासनासे होता है और आवरण अर्थात् स्वरूपविस्मृति या अज्ञानका नाश ज्ञानसे होता है। इस प्रकार चित्तके इन त्रिविध दोषोंके लिये ये अलग-अलग तीन ओषधियाँ हैं। इन तीनोंके द्वारा तीन ही प्रकारकी गतियाँ होती हैं। सकामकर्मी लोग धूममार्गसे स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म लेते हैं। निष्कामकमी और उपासक अर्चिरादि मार्गसे अपने उपास्यदेवके लोकमें जाकर अपने अधिकारानुसार सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं। इन दोनों गतियोंका इस उपनिषद्-के पाँचवें अध्यायमें विशदरूपसे वर्णन किया गया है। इन दोनोंसे अलग जो तत्त्वज्ञानी होते हैं उनके प्राणोंका उत्क्रमण (लोकान्तरमें गमन.) नहीं होता; उनके शरीर यहीं अपने-अपने तत्त्वोंमें लीन हो जाते हैं और उन्हें यहाँ ही कैवल्यपद प्राप्त होता है।

अद्वैतसिद्धान्तके अनुसार मोक्षका साक्षात् साधन ज्ञान ही है; इस विषयमें 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' 'अथ

( ४ )

येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति' 'सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' आदि बहुत-सी श्रुतियाँ प्रमाण हैं। निष्काम कर्म और उपासना मल और विक्षेपकी निवृत्ति करके ज्ञानद्वारा मुक्ति देते हैं। ज्ञानसे ही आत्मसाक्षात्कार होता है और फिर उसकी दृष्टिमें संसार और संसारबन्धनका अत्यन्ताभाव होकर सर्वत्र अशेष-विशेष-शून्य एक अखण्ड चिदानन्दघन सत्ता ही रह जाती है। इस प्रकार जब उसकी दृष्टिमें प्रपञ्च ही नहीं रहता, तब अपना पञ्चकोशात्मक शरीर और उसके स्थिति या विनाश ही कहाँ रह सकते हैं तथा उसके लिये जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका भी प्रश्न नहीं रहता; वह तो नित्य मुक्त ही है। उसके इस वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण अन्य लोग उसमें जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका आरोप करते हैं; वह मुक्त होता नहीं, मुक्तस्वरूप ही है। श्रुति कहती है—'विमुक्तश्च विमुच्यते'।

इस प्रकार यह निश्चय हुआ कि यद्यपि मोक्षका साक्षात् साधन ज्ञान ही है तथापि ज्ञानप्राप्तिका अधिकार प्रदान करनेवाले होनेके कारण कर्म और उपासना भी उसके साधन अवश्य हैं। इस शाखामें कर्मनिरूपण पहले किया जा चुका है; अब आत्मज्ञानका निरूपण करना है, इसीलिये यह उपनिषद् आरम्भ की गयी है। इसमें भी तत्त्वज्ञानमें उपयोगी होनेके कारण पहले भिन्न-भिन्न उपासनाओंका ही वर्णन किया गया है। इस उपनिषद्में कुल आठ अध्याय हैं, जिनमेंसे पहले पाँच अध्यायोंमें प्रधानतया उपासनाओंका वर्णन है और अन्तिम तीन अध्यायोंमें ज्ञानका।

इसमें उपासना और ज्ञान दोनों ही विषयोंका बड़ा सुन्दर विवेचन है। उन्हें सुगमतासे समझानेके लिये जगह-जगह कई आख्यायिकाएँ भी दी गयी हैं, जिनसे उन विषयोंके हृदयंगम होनेमें सहायता मिलनेके अतिरिक्त कई प्रकारकी शिक्षाएँ भी मिलती हैं। प्रथम अध्यायमें इभ्यग्राममें रहनेवाले उषस्तिकी कथा है। उषस्ति यज्ञ-यागादि कर्मकाण्डमें बहुत कुशल थे। एक बार कुरुदेशमें, जहाँ वे रहते थे, ओले और पत्थरोंकी वर्षा होनेके कारण ऐसा अकाल पड़ा कि उन्हें कई दिनोंतक निराहार रहना पड़ा। जब प्राणसंकट उपस्थित हुआ, तब उन्होंने एक हाथीवानसे जाकर कुछ अन्न माँगा।

उसके पास कुछ उड़द थे; परन्तु वे उच्छिष्ट थे, इसलिये उन्हें देनेमें उसे हिचक हुई। परन्तु उषस्तिने उन्हींको माँगकर अपने प्राणोंकी

( ५ )

रक्षा की। जब वह उच्छिष्ठ जल भी देने लगा तो उन्होंने 'यह उच्छिष्ठ है' ऐसा कहकर निषेध कर दिया। इसपर जब हाथीवानने शङ्का की कि क्या जूठे उड़द खानेसे उच्छिष्ठ-भोजनका दोष नहीं हुआ ? तो वे बोले—

'न वा अजीविष्यमिमानखादन्····कामो मे उदपानम्'

अर्थात् इन्हें खाये बिना मैं जीवित नहीं रह सकता था, जल तो मुझे इच्छानुसार सर्वत्र मिल सकता है। इस प्रकार उच्छिष्ट जलके लिये निषेध करके उन्होंने यह आदर्श उपस्थित कर दिया कि मनुष्य आचारसम्बन्धी नियमोंकी उपेक्षा भी तभी कर सकता है जब कि उसके बिना प्राणरक्षाका कोई दूसरा उपाय ही न हो।

प्रथम अध्यायमें जो शिलक, चैकितायन और प्रवाहणका संवाद है तथा पञ्चम अध्यायमें जो उद्दालकके साथ प्राचीनशालादि पाँच महर्षियोंने राजा अश्वपतिके पास जाकर वैश्वानर आत्माके विषयमें जिज्ञासा की है, उन दोनों प्रसंगोंसे यह बात स्पष्ट होती है कि सनातन शिष्टाचारके अनुसार उपदेश देनेका अधिकार ब्राह्मणोंको ही है; परन्तु यदि कोई उत्कृष्ट विद्या किसी अन्य द्विजातिके पास हो तो भी ली जा सकती है। किसी भी कल्याणकारिणी विद्याको ग्रहण करनेके लिये मनुष्यको कितने त्याग, तप, सेवा, सत्य और विनय आदिकी आवश्यकता है—यह बात कई आख्यायिकाओंमें प्रदर्शित की गयी है। राजा जानश्रुतिने संवर्ग-विद्याकी प्राप्तिके लिये गाड़ीवाले रैक्वका तिरस्कार सहा और उन्हें बहुत-सा धन, राज्य एवं अपनी कन्या देकर भी उस विद्याको ग्रहण किया। इन्द्रने आत्मविद्याकी प्राप्तिके लिये एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया, सत्यकाम जाबालने जब अपने गुरु हारिद्रुमत गौतमसे उपनयनके लिये प्रार्थना की और उन्होंने उसका गोत्र पूछा तो उसने उस विषयमें अपने अज्ञानका कारण स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया; उसके इस स्पष्ट कथनसे ही आचार्यको निश्चय हो गया कि यह ब्राह्मण ही है और उन्होंने उसे दीक्षा दे दी। फिर सत्यकामने गुरु-सेवाके प्रभावसे ही ब्रह्मविद्या प्राप्त कर ली। सत्यकाम आचार्य हारिद्रुमतके पास विद्याध्ययनके लिये गया था; आचार्यने उसका उपनयन कर उसे चार सौ गौएँ देकर आज्ञा दी कि इन्हें जंगलमें ले जाओ; जबतक इनकी संख्या

( ६ )

बढ़कर एक सहस्र न हो जाय तबतक मत लौटना। बालक सत्यकामने गुरुजीके इस आदेशका प्राणपणसे पालन किया और केवल गोचारणद्वारा ही उसे गुरुकृपासे ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया। जिस समय वह गौओंको लेकर गुरुजीके पास आया उस समय उसके तेजको देखकर उन्हें भी कहना पड़ा—

'ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशास'

'हे सोम्य! तू ब्रह्मवेत्ता-सा जान पड़ता है, तुझे किसने उपदेश दिया है?' इसी प्रकार सत्यकामके शिष्य उपकोसलको भी नियमानुसार अग्निहोत्र करते-करते ही गुरुकृपासे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हो गयी। इन दृष्टान्तोंका आशय यही है कि जिस पुरुषका जिस समय जो कर्तव्य है उसे उस समय सर्वथा उसीको यथावत् रूपसे पालन करना चाहिये। अपने कर्तव्यका यथोचित रीतिसे पालन करना ही कल्याणकारक है।

सप्तम अध्यायमें सनत्कुमार और नारदका संवाद है। देवर्षि नारदजी आत्मज्ञानकी जिज्ञासासे सनत्कुमारजीकी शरणमें जाते हैं। सनत्कुमारजी पूछते हैं—'तुम मुझे यह बतलाओ कि कौन-कौन विद्याएँ जानते हो? उससे आगे मैं उपदेश करूँगा।' नारदजी कहते हैं—'मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण-रूप पञ्चम वेद, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधि-शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षा, भूततन्त्र, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड और संगीतविद्या—ये सब जानता हूँ।' इतनी विद्याएँ जाननेपर भी नारदजीको शान्ति नहीं है; शान्ति मिले कैसे? किसी राजाको राज्य, वैभव, स्त्री, पुत्र और सम्मानादि सभी प्राप्त हों, परन्तु उसके शरीरमें भयंकर पीड़ा हो तो वह सारा वैभव भी उसे शान्ति नहीं दे सकता? इसी प्रकार संसारका बड़े-से-बड़ा ऐश्वर्य प्राप्त होनेपर भी आत्मज्ञानके बिना पूर्ण शान्ति प्राप्त होना सर्वथा असम्भव है। बिना भगवान्‌का साक्षात्कार किये दुःखोंसे छुटकारा पाना आकाशको चमड़ेके समान लपेट लेनेकी तरह असम्भव है—

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥

( ७ )

इसीसे नारदजी कहते हैं—

सो हं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतँ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य-
स्तरति शोकमात्मविदिति सो हं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य
पारं तारयतु । ( ७।१।३ )

‘भगवन् ! मैं केवल शास्त्रज्ञ हूँ, आत्मज्ञ नहीं हूँ। मैंने आप-जैसों-से सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है और मुझे शोक है, इसलिये भगवान् मुझे शोकसे पार करें।’ इससे यह निश्चय होता है कि केवल शास्त्रज्ञानसे संसृतिचक्ररूप शोकसमुद्रको पार नहीं किया जा सकता; इसके लिये तो अनुभवकी आवश्यकता है। जब सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, अशेषविद्यामहार्णव देवर्षि नारदको भी उनकी विद्या शान्ति प्रदान नहीं कर सकी तो हम-जैसे साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या है ?

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषद्में बहुत-से उपयोगी विषय हैं। प्राचीन कालसे ही इसका बहुत मान रहा है। वेदान्त-सूत्रोंमें जिन श्रुतियोंपर विचार किया गया है उनमें सबसे अधिक इसी उपनिषद्की हैं। इसका ज्ञानकाण्ड तो जिज्ञासुओंकी अक्षय निधि है। जो ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य अद्वैतसम्प्रदायमें ब्रह्मात्मैक्य-बोधका प्रधान साधन माना जाता है वह भी इसीके छठे अध्यायमें आया है। वहाँ आरुणिने भिन्न-भिन्न दृष्टान्त देकर नौ बार इसी वाक्यसे अपने पुत्र श्वेतकेतुको आत्मतत्त्वका उपदेश किया है।

औपनिषद-दर्शन ही सम्यग्दर्शन है। इसीसे भवभयका निरास होकर आत्यन्तिक आनन्दकी प्राप्ति होती है। इस दृष्टिको प्राप्त कर लेना ही मानव-जीवनका प्रधान उद्देश्य है—यही परम पुरुषार्थ है। इसे पाये बिना जीवन व्यर्थ है, इसे न पा सकना ही सबसे बड़ी हानि है; यही बात केन-श्रुति भी कहती है—

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । ( २।५ )

अतः इस दृष्टिको प्राप्त करनेके लिये प्रत्येक पुरुषको प्राणपणसे प्रयत्न करना चाहिये। भगवान् हमें इसे प्राप्त करनेकी योग्यता दें।

अनुवादक—