छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय
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प्रथम खण्ड
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राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान
| वायुप्राणयोर्ब्रह्मणः पाददृष्ट्य-<br>ध्यासः पुरस्ताद्वर्णितः । अथे-<br>दानीं तयोः साक्षाद्ब्रह्मत्वेनोपा-<br>स्यत्वायोत्तरमारभ्यते। सुखाव-<br>बोधार्थारख्यायिका विद्यादान-<br>ग्रहणविधिप्रदर्शनार्था च ।<br>श्रद्धान्नदानानुद्धतत्वादीनां च<br>विद्याप्राप्तिसाधनत्वं प्रदर्श्यत<br>आख्यायिकया— | वायु और प्राणमें ब्रह्मकी पाद-<br>दृष्टिके अध्यासका वर्णन पहले<br>(तृतीय अध्यायमें) कर दिया गया।<br>अब इस समय उनका साक्षात्<br>ब्रह्मरूपसे उपास्यत्व बतलानेके<br>लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया<br>जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है<br>वह सरलतासे समझनेके लिये तथा<br>विद्याके दान और ग्रहणकी विधि<br>प्रदर्शित करनेके लिये है। साथ ही<br>इस आख्यायिकाद्वारा श्रद्धा, अन्नदान<br>और अनुद्धतत्व (विनय) आदिका<br>विद्याप्राप्तिमें साधनत्व भी प्रदर्शित<br>किया जाता है— |
ॐ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस । स ह सर्वत आवसथान्मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥
जनश्रुतकी संतान-परम्परामें उत्पन्न एवं उसके पुत्रका पौत्र श्रद्धापूर्वक देनेवाला एवं बहुत दान करनेवाला था और उसके यहाँ [दान करनेके लिये]
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३५३
बहुत-सा अन्न पकाया जाता था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायँगे, सर्वत्र निवासस्थान (धर्मशाले) बनवा दिये थे ॥१॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| जानश्रुतिर्जनश्रुतस्यापत्यम्, ह ऐतिह्यार्थः, पुत्रस्य पौत्रः पौत्रायणः स एव श्रद्धादेयः श्रद्धापुरःसरमेव ब्राह्मणादिभ्यो देयमस्येति श्रद्धादेयः । बहुदायी प्रभूतं दातुं शीलमस्येति बहुदायी । बहुपाक्यो बहु पक्तव्यमहन्यहनि गृहे यस्यासौ बहुपाक्यः। भोजनार्थिभ्यो बह्वस्य गृहेऽन्नं पच्यत इत्यर्थः । एवंगुणसम्पन्नोऽसौ जानश्रुतिः पौत्रायणो विशिष्टे देशे काले च कस्मिंश्चिदास बभूव । | जानश्रुतिका—जनश्रुतका अपत्य ( वंशधर ), 'ह' यह निपात इतिहासका द्योतक है, पुत्रके पोतेको पौत्रायण कहते हैं; वही श्रद्धादेय था, उसके पास जो कुछ था वह ब्राह्मण आदिको श्रद्धापूर्वक देनेके लिये ही था, इसलिये उसे श्रद्धादेय कहा गया है; बहुदायी—जिसका स्वभाव बहुत दान करनेका था और बहुपाक्य—जिसके घरमें नित्यप्रति बहुत-सा पाक्य—पकाया हुआ अन्न रहता था अर्थात् जिसके घर भोजनार्थियोँके लिये बहुत-सा अन्न पकाया जाता था—ऐसा था, ऐसे गुणोंसे युक्त वह जनश्रुतकी संततिमें उत्पन्न हुआ उसका प्रपौत्र किसी उत्तम देश और कालमें हुआ था। |
| स ह सर्वतः सर्वासु दिक्षु ग्रामेषु नगरेषु चावसथानेत्य वसन्ति येष्वित्यावसथास्तानमापयाञ्चक्रे कारितवानित्यर्थः । सर्वत एव मे ममान्नं तेष्वावसथेषु | प्रसिद्ध है, उसने सब ओर—समस्त दिशाओंमें ग्राम और नगरोंके भीतर आवसथ ( धर्मशाला )—जिनमें आकर यात्री ठहरते हैं वे आवसथ कहलाते हैं—निर्मित कराये अर्थात् बनवा दिये थे। इससे उसका यह अभिप्राय था कि |