छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
चतुर्थ अध्याय
( १४ )
एकोनविंश खण्ड
१२४. आदित्य और अण्डदृष्टिसे अध्यात्म एवं आधिदैविक उपासना... ३४४
चतुर्थ अध्याय
प्रथम खण्ड
१२५. राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान .... .... ३५२
द्वितीय खण्ड
१२६. रैक्वके प्रति जानश्रुतिकी उपसत्ति .... .... ३६३
तृतीय खण्ड
१२७. रैक्वद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश .... .... ३६९
१२८. संवर्गकी स्तुतिके लिये आख्यायिका ... .... ३७२
चतुर्थ खण्ड
१२९. सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गौ चराना .... ३८०
पञ्चम खण्ड
१३०. वृषभद्वारा सत्यकामको ब्रह्मके प्रथम पादका उपदेश.... .... ३८६
षष्ठ खण्ड
१३१. अग्निद्वारा ब्रह्मके द्वितीय पादका उपदेश .... .... ३८९
सप्तम खण्ड
१३२. हंसद्वारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश .... .... ३९२
अष्टम खण्ड
१३३. मद्गुद्वारा ब्रह्मके चतुर्थ पादका उपदेश .... ... ३९४
नवम खण्ड
१३४. सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना .... .... ३९७
दशम खण्ड
१३५. उपकोसलके प्रति अग्निद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश .... ... ४००
एकादश खण्ड
१३६. गार्हपत्याग्निविद्या ... ... ४०९
द्वादश खण्ड
१३७. अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या .... ... ४१२
( १५ )
त्रयोदश खण्ड
१३८. आहवनीयाग्निविद्या .... ४१४
चतुर्दश खण्ड
१३९. आचार्यका आगमन .... ४१६
१४०. आचार्य और उपकोसलका संवाद .... ४१७
पञ्चदश खण्ड
१४१. आचार्यका उपदेश—नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना .... ४२०
१४२. ब्रह्मवेत्ताकी गति .... ४२३
षोडश खण्ड
१४३. यज्ञोपासना .... ४२८
१४४. ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि .... ४३०
१४५. ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा .... ४३२
सप्तदश खण्ड
१४६. यज्ञ दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना .... ४३४
१४७. विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता .... ४३८
पञ्चम अध्याय
प्रथम खण्ड
१४८. ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणोपासना .... ४४३
१४९. इन्द्रियोंका विवाद .... ४४६
१५०. प्रजापतिका निर्णय .... ४४७
१५१. वागिन्द्रियकी परीक्षा .... ४४८
१५२. चक्षुकी परीक्षा .... ४४९
१५३. श्रोत्रकी परीक्षा .... ४४९
१५४. मनकी परीक्षा .... ४५०
१५५. प्राणकी परीक्षा और विजय .... ४५१
१५६. इन्द्रियोंद्वारा प्राणकी स्तुति .... ४५२
द्वितीय खण्ड
१५७. प्राणका अन्ननिर्देश .... ४५८
१५८. प्राणका वस्त्रनिर्देश .... ४६०
१५९. प्राणविद्याकी स्तुति .... ४६३
१६०. मन्थकर्म .... ४६४
( १६ )
तृतीय खण्ड
१६१. पाञ्चालोंकी सभामें श्वेतकेतु .... ... ४७२
१६२. प्रवाहणके प्रश्न .... .... ४७३
१६३. प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना .... ४७५
१६४. पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना .... .... ४७७
१६५. प्रवाहणका वरप्रदान ... .... ४७९
चतुर्थ खण्ड
१६६ पञ्चम प्रश्नका उत्तर .... .... ४८१
१६७. लोकरूपा अग्निविद्या .... .... ४८३
पञ्चम खण्ड
१६८. पर्जन्यरूपा अग्निविद्या .... • .... ४८७
षष्ठ खण्ड
१६९. पृथिवीरूपा अग्निविद्या .... ... ४८९
सप्तम खण्ड
१७०. पुरुषरूपा अग्निविद्या ... ... ४९१
अष्टम खण्ड
१७१. स्त्रीरूपा अग्निविद्या ... .... ४९३
नवम् खण्ड
१७२. पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए आपकी गति ... ४९६
दशम खण्ड
१७३. प्रथम प्रश्नका उत्तर ... .... ५००
१७४. तृतीय प्रश्नका उत्तर ... .... ५०९
( देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान )
१७५. द्वितीय प्रश्नका उत्तर .... .... ५१४
( पुनरावर्तनका क्रम )
१७६. अनुशयी जीवोंकी कर्मानुरूप गति .... .... ५२९
१७७. चतुर्थ प्रश्नका उत्तर ... .... ५३१
( अशास्त्रीय प्रवृत्तिवालोंकी गति )
१७८. पाँच पतित .... .... ५३४
१७९. पञ्चाग्निविद्याका महत्त्व .... ... ५३५
( १७ )
एकादश खण्ड
१८०. औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव .... ५३६
१८१. औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना ... .... ५३८
१८२. उद्दालकका औपमन्यवादिके सहित अश्वपतिके पास आना ... .... ५३९
१८३. अश्वपतिद्वारा मुनियोंका स्वागत ... .... ५४०
१८४. अश्वपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना ... .... ५४२
१८५. राजाके प्रति मुनियोंकी उपसत्ति .... .... ५४३
द्वादश खण्ड
१८६. अश्वपति और औपमन्यवका संवाद ... ... ५४५
त्रयोदश खण्ड
१८७. अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद ... .... ५४९
चतुर्दश खण्ड
१८८. अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद ... .... ५५१
पञ्चदश खण्ड
१८९. अश्वपति और जनका संवाद .... ... ५५३
षोडश खण्ड
१९०. अश्वपति और बुडिलका संवाद ... — ५५५
सप्तदश खण्ड
१९१. अश्वपति और उद्दालकका संवाद ... ... ५५७
अष्टादश खण्ड
१९२. अश्वपतिका उपदेश—वैश्वानरकी समस्तोपासनाका फल .... ५५९
१९३. वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप ... ... ५६१
एकोनविंश खण्ड
१९४. भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये ‘प्राणाय स्वाहा’ इस पहली आहुतिका वर्णन .... ... ५६३
विंश खण्ड
१९५. ‘व्यानाय स्वाहा’ इस दूसरी आहुतिका वर्णन ... .... ५६५
एकविंश खण्ड
१९६. ‘अपानाय स्वाहा’ इस तीसरी आहुतिका वर्णन .... ... ५६६
( १८ )
द्वाविंश खण्ड
१९७. 'समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन ... ५६७
त्रयोविंश खण्ड
१९८. 'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन ... ... ५६८
चतुर्विंश खण्ड
१९९. अविद्वान्के हवनका स्वरूप ... ... ५६९
२००. विद्वान्के हवनका फल .... .... ५६९
षष्ठ अध्याय
प्रथम खण्ड
२०१. आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश ... .... ५७३
द्वितीय खण्ड
२०२. अन्य पक्षके खण्डनपूर्वक जगत्की सद्रूपताका समर्थन ... ५८२
तृतीय खण्ड
२०३. सृष्टिका क्रम .... .... ... ६०४
चतुर्थ खण्ड
२०४. एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान ... ... ६१३.
पञ्चम खण्ड
२०५. अन्न आदिके त्रिविध परिणाम ... .... ६२३
षष्ठ खण्ड
२०६. अन्न आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता है ... .. ६२९
सप्तम खण्ड
२०८. षोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश ... .... ६३२
अष्टम खण्ड
२०७. सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश ... .... ६४०
नवम खण्ड
२०९. सुषुप्तिमें 'सत्' की प्राप्तिका ज्ञान न होनेमें मधुमक्खियोंका दृष्टान्त ... .... .... ६६३
दशम खण्ड
२१०. नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६६८
एकादश खण्ड
२११. वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... .... ६७१
द्वादश खण्ड
२१२. न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... ... ६७६
( १९ )
त्रयोदश खण्ड
२१३. लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... .... ६८०
चतुर्दश खण्ड
२१४. अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... ... ६८५
पञ्चदश खण्ड
२१५. मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६९४
षोडश खण्ड
२१६. चोरके तप्त परशुग्रहणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६९८
सप्तम अध्याय
प्रथम खण्ड
२१७. नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश ... ... ७१०
द्वितीय खण्ड
२१८. नामकी अपेक्षा वाक्की महत्ता ... ... ७२१
तृतीय खण्ड
२१९. वाक्की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता ... .... ७२४
चतुर्थ खण्ड
२२०. मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता ... ... ७२७
पञ्चम खण्ड
२२१. संकल्पकी अपेक्षा चित्तकी प्रधानता .... ... ७३४
षष्ठ खण्ड
२२२. चित्तकी अपेक्षा ध्यानका महत्त्व ... .... ७३८
सप्तम खण्ड
२२३. ध्यानसे विज्ञानकी महत्ता .... .... ७४२
अष्टम खण्ड
२२४. विज्ञानसे बलकी श्रेष्ठता ... ... ७४५
नवम खण्ड
२२५. बलकी अपेक्षा अन्नकी प्रधानता .... .... ७४९
दशम खण्ड
२२६. अन्नकी अपेक्षा जलका महत्त्व .... .... ७५२
एकादश खण्ड
२२७. जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता ... .... ७५५
द्वादश खण्ड
२२८. तेजसे आकाशकी प्रधानता .... .... ७५८
( २० )
त्रयोदश खण्ड
२२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व .... ... ७६१
चतुर्दश खण्ड
२३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता .... ... ७६४
पञ्चदश खण्ड
२३१. आशासे प्राणका प्राधान्य .... ... ७६७
षोडश खण्ड
२३२. सत्य ही जानने योग्य है .... ... ७७४
सप्तदश खण्ड
२३३. विज्ञान ही जानने योग्य है ... ... ७७६
अष्टादश खण्ड
२३४. मति ही जानने योग्य है .... .... ७७९
एकोनविंश खण्ड
२३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है .... ..- ७८०
विंश खण्ड
२३६. निष्ठा ही जानने योग्य है .... .... ७८१
एकविंश खण्ड
२३७. कृति ही जानने योग्य है ... .... ७८२
द्वाविंश खण्ड
२३८. सुख ही जानने योग्य है .... ... ७८३
त्रयोविंश खण्ड
२३९. भूमा ही जानने योग्य है ... .... ७८५
चतुर्विंश खण्ड
२४०. भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन ... .... ७८६
पञ्चविंश खण्ड
२४१. सर्वत्र भूमा ही है .... ... ७९३
षड्विंश खण्ड
२४२. इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश .... ... ७९८
अष्टम अध्याय
प्रथम खण्ड
२४३. दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना ... .... ८०३
२४४. पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व .... .... ८१९
( २१ )
द्वितीय खण्ड
२४५. दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल ... ... ८२१
तृतीय खण्ड
२४६. असत्यसे आवृत्त सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना .... ८२६
चतुर्थ खण्ड
२४७. सेतुरूप आत्माकी उपासना .... ... ८३६
पञ्चम खण्ड
२४८. यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यादिदृष्टि .... .... ८४२
षष्ठ खण्ड
२४९. हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना ... .... ८५४
सप्तम खण्ड
२५०. आत्मतत्त्वका अनुसंधान करनेके लिये इन्द्र और विरोचनका प्रजापतिके पास जाना ... .... ८६५
अष्टम खण्ड
२५१. इन्द्र तथा विरोचनका जलके शिकोरेमें अपना प्रतिबिम्ब देखना .... ८७६
नवम खण्ड
२५२. इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना ... ... ८८७
दशम खण्ड
२५३. इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश ... .... ८९४
एकादश खण्ड
२५४. सुषुप्त पुरुषका उपदेश ... .... ९०१
द्वादश खण्ड
२५५. मर्त्यशरीर आदिका उपदेश .... ... ९०६
त्रयोदश खण्ड
२५६. ‘श्यामाच्छबलम्’ इस मन्त्रका उपदेश ... .... ९३७
चतुर्दश खण्ड
२५७. कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश ... ... ९३९
पञ्चदश खण्ड
२५८. आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन ... ... ९४३
ॐ
केशाः कञ्जालिकासाभाः
शमब्जाम्बुनगौकसः ।
विविगोपतयो दद्युः
करकारिपिनाकिनः ॥
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भाष्यकार भगवान् शङ्कर
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
छान्दोग्योपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
सच्चिदानन्दसान्द्राय सर्वातीताय साक्षिणे ।
नमः श्रीदेशिकेन्द्राय शिवायाशिवघातिने ॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
मेरे [हाथ-पाँव आदि] अङ्ग सब प्रकारसे पुष्ट हों, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र पुष्ट हों तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बल प्राप्त करें । उपनिषदमें प्रतिपादित ब्रह्म ही सब कुछ है । मैं ब्रह्मका निराकरण (त्याग) न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा अनिराकरण (निरन्तर मिलन) हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें जो शम आदि धर्म कहे गये हैं वे ब्रह्मरूप आत्मामें निरन्तर रमण करनेवाले मुझमें सदा बने रहें, वे मुझमें सदा बने रहें । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापकी शान्ति हो ।