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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
चाकाशो नामरूपयोः स्वात्मस्थयोर्जगद्बीजभूतयोः सलिलस्येव फेनस्थानीययोर्निर्वहिता निर्वोढा व्याकर्ता। ते नामरूपे यदन्तरा यस्य ब्रह्मणोऽन्तरा मध्ये वर्तेते तयोर्वा नामरूपयोरन्तरा मध्ये यन्नामरूपाभ्यामस्पृष्टं यदित्येतत्तद्ब्रह्म नामरूपविलक्षणं नामरूपाभ्यामस्पृष्टं तथापि तयोर्निर्वोढ्रेवंलक्षणं ब्रह्मेत्यर्थः। इदमेव मैत्रेयीब्राह्मणेनोक्तं चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यत एकवाक्यता।संज्ञक आत्मा) जलके फेनस्थानीय अपनेमें स्थित नाम और रूपका निर्वहिता—निर्वाह करनेवाला अर्थात् उन्हें व्यक्त करनेवाला है। वे नाम और रूप जिसके अन्तर्गत हैं अर्थात् जिस ब्रह्मके अन्तरा—मध्यमें वर्तमान हैं, अथवा जो उन नाम और रूपके अन्तरा—मध्यमें है और उन नाम और रूपसे असंस्पृष्ट है; तात्पर्य यह है कि वह ब्रह्म नाम-रूपसे विलक्षण और नाम रूपसे असंस्पृष्ट है, तो भी उनका निर्वाह करनेवाला है; अर्थात् ब्रह्म ऐसे लक्षणोंवाला है। यही बात [बृहदारण्यकान्तर्गत] मैत्रेयीब्राह्मणमें कही गयी है कि सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुगति होनेके कारण सबकी चिद्रूपता है—इस प्रकार इन वाक्योंकी एकवाक्यता ज्ञात होती है।
कथं तदवगम्यते? इत्याह—स आत्मा। आत्मा हि नाम सर्वजन्तूनां प्रत्यक्चेतनः स्वसंवेद्यः प्रसिद्धस्तेनैव स्वरूपेणानीयाशरीरा व्योमवत्सर्वगत आत्मायह बात कैसे ज्ञात होती है? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'स आत्मा'—आत्मा सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यक्चेतन और स्वसंवेद्य प्रसिद्ध है; उसी रूपसे उन्नयन (ऊहा) करके वह अशरीर और आकाशके समान सर्वगत आत्मा

खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ ९४१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ब्रह्मेत्यवगन्तव्यम् । तच्चात्मा ब्रह्मामृतममरणधर्मा ।ही ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। वह आत्मरूप ब्रह्म अमृत—अमरणधर्मा है।
अत ऊर्ध्वं मन्त्रः। प्रजापतिश्चतुर्मुखस्तस्य सभां वेश्म प्रभुविमितं वेश्म प्रपद्ये गच्छेयम् । किञ्च यशोऽहं यशो नामात्माऽहं भवामि ब्राह्मणानाम् । ब्राह्मणा एव हि विशेषतस्तमुपासते ततस्तेषां यशो भवामि । तथा राज्ञां विशां च । तेऽप्यधिकृता एवेति तेषामप्यात्मा भवामि । तद्यशोऽहमनुप्रापत्स्येऽनुप्राप्तुमिच्छामि । स हाहं यशसामात्मनां देहेन्द्रियमनोबुद्धिलक्षणानामात्मा ।इसके आगे मन्त्र है—प्रजापति चतुर्मुख ब्रह्माका नाम है, उनकी सभा अर्थात् प्रभुविमितनामक गृहको मैं प्राप्त होऊँ--जाऊँ। मैं ब्राह्मणोंका यश-यशसंज्ञक आत्मा होऊँ क्योंकि ब्राह्मण ही विशेषरूपसे उसकी उपासना करते हैं; अतः मैं उनका यश होऊँ। इसी प्रकार मैं क्षत्रिय और वैश्योंका भी यश होऊँ। वे भी अधिकारी ही हैं, अतः मैं उनका भी आत्मा होऊँ। मैं उनका यश प्राप्त करना चाहता हूँ। वह मैं यशःस्वरूप आत्माओंका अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप आत्माओंका आत्मा हूँ।
किमर्थमहमेवं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—श्येतं वर्णतः पक्वबदरसमं रोहितम् । तथादत्कं दन्तरहितमप्यदत्कं भक्षयितृ स्त्रीव्यञ्जनं तत्सेविनां तेजोबलवीर्यविज्ञान-मैं इस प्रकार आत्माको क्यों प्राप्त होता हूँ ? सो बतलाया जाता है—श्येत—जो रङ्गमें पके हुए बेरके समान लाल है, यथा 'अदत्क'—दन्तरहित होनेपर भी 'अदत्क' भक्षण करनेवाले स्त्रीचिह्नको; क्योंकि वह अपना सेवन करनेवालेके तेज, बल, वीर्य, विज्ञान