छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| पनयाय च वक्ष्यति साध्वलङ्कृतावित्येवमादि ।<br>तौ होचतुः--सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति, यथैवावां हे भगवो लोमनखादिमन्तौ स्वः, एवमेवेदं लोमनखादिसहितमावयोः प्रतिरूपमुदशरावे पश्याव इति ॥ १ ॥ | निराकरण करनेके लिये [ पीछे ] 'साध्वलङ्कृतौ' इत्यादि वाक्य भी कहा ।<br>उन्होंने कहा—'हे भगवन् ! हम दोनों अपने आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं । हे भगवन् ! हमारे स्वरूप जैसे लोम एवं नखादियुक्त हैं उसी प्रकार हम जलके शकोरेमें अपने प्रतिबिम्बको भी लोम और नखादियुक्त देखते हैं' ॥ १ ॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥
उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलंकृत होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखो ।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलंकृत हो, सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखा । उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' ॥ २ ॥
| तौ ह पुनः प्रजापतिरुवाच—<br>छायात्मनिश्चयापनयाय साध्वलङ्कृतौ यथा स्वगृहे सुवसनौ महा- | उन दोनोंसे प्रजापतिने छायात्मामें आत्मत्वके निश्चयकी निवृत्तिके लिये फिर कहा— 'तुम दोनों जिस प्रकार अपने घरमें |
|---|
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ईवस्त्रपरिधानौ परिष्कृतौ छिन्नलोमनखौ च भूत्वोदशरावे पुनरीक्षेथामिति । इह च नादिदेश यदज्ञातं तन्मे प्रब्रूतमिति । कथं पुनरनेन साध्वलङ्कारादि कृत्वोदशरावेऽवेक्षणेन तयोश्छायात्मग्रहोऽपनीतः स्यात् । <br><br> साध्वलङ्कारसुवसनादीनामागन्तुकानां छायाकरत्वमुदशरावे यथा शरीरसम्बद्धानामेवं शरीरस्यापिच्छायाकरत्वं पूर्वं बभूवेति गम्यते । शरीरैकदेशानां च लोमनखादीनां नित्यत्वेनाभिप्रेतानामखण्डितानां छायाकरत्वं पूर्वमासीत् । छिन्नेषु च तेषु नैव लोमनखादिच्छाया दृश्यतेऽतो लोमनखादिवच्छरीरस्याप्यागमापायित्वं सिद्धमित्युदशरावादौ | रहते हो उसी भाँति अच्छी तरह अलंकृत होकर 'सुवसन'—महामूल्य वस्त्र धारणकर तथा परिष्कृत यानी लोम और नख काटकर जलके शकोरेमें फिर देखो ।' यहाँ प्रजापतिने ऐसा आदेश नहीं किया कि उस समय तुम जो न जान सको वह मुझे बतलाना । [ क्योंकि वे यही चाहते थे कि ] इस प्रकार सुन्दर अलंकारादि धारण कर जलके शकोरेमें देखनेसे किसी-न किसी तरह उनकी छायात्मबुद्धि निवृत्त हो जाय । <br><br> जिस प्रकार देहसे सम्बद्ध सुन्दर अलंकार और बहुमूल्य वस्त्रादि आगन्तुक पदार्थ जलके शकोरेमें अपनी छाया प्रकट करते हैं उसी प्रकार पहले शरीर भी छायाकारक था—ऐसा इससे ज्ञात होता है । शरीरके एकदेशरूप तथा नित्यरूपसे माने गये अखण्डित लोम और नखादि भी पहले छायाजनक थे । किंतु अब उन्हें काट लिये जानेपर उन लोम एवं नखादिकी छाया दिखायी नहीं देती । इससे लोम और नखादिके समान शरीर भी आगमापायी ( उत्पन्न और नष्ट होनेवाला ) सिद्ध होता है । |