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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
८७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
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| ८७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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उनसे प्रजापतिने कहा—'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी देता है यह आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है।' [तब उन्होंने पूछा—] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है उनमें आत्मा कौन-सा है ?' इसपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जिस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥
| तावेवं तपस्विनौ शुद्धकल्मषौ योग्यावुपलक्ष्य प्रजापतिरुवाच ह । य एषोऽक्षिणि पुरुषो निवृत्तचक्षुर्भिर्मृदितकषायैर्दृश्यते योगिभिर्द्रष्टा । एष आत्मापहतपाप्मादिगुणो यमवोचं पुराहं यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिरेतदमृतं भूमाख्यम् । अत एवाभयमत एव ब्रह्म वृद्धतममिति । | उन्हें इस प्रकार तपस्वी, विशुद्धकल्मष (जिनके दोष निवृत्त हो गये हैं) और योग्य जानकर प्रजापतिने कहा—'जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं और जिनके राग-द्वेषादि दोषोंका नाश हो गया है उन योगियोंको जो नेत्रके भीतर यहाँ द्रष्टा पुरुष दिखायी देता है, यह अपहतपाप्मादि गुणोंवाला आत्मा है, जिसके विषयमें पहले मैंने कहा था और जिसका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोक और कामनाओंकी प्राप्ति हो जाती है। यह भूमासंज्ञक अमृत है, इसलिये अभय है और इसीसे ब्रह्म यानी वृद्धतम है।' |
| अथैतत्प्रजापतिनोक्तमक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति वचः श्रुत्वा छायारूपं पुरुषं जगृहतुः । | तब प्रजापतिके कहे हुए 'नेत्रोंके भीतर जो पुरुष दिखायो देता है' इस वाक्यसे उन्होंने छायारूप पुरुषको ग्रहण किया |
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खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ [८०३
| गृहीत्वा च दृढीकरणाय प्रजापतिं पृष्टवन्तौ । अथ योऽयं हे भगवोऽप्सु परिख्यायते परिसमन्ताज्ज्ञायते यश्चायमादर्श आत्मनः प्रतिबिम्बाकारः परिख्यायते खड्गादौ च कतम एष एषां भवद्भिरुक्तः किं वैक एव सर्वेष्विति ।<br><br>एवं पृष्टः प्रजापतिरुवाच—<br>एष उ एव यश्चक्षुषि द्रष्टा मयोक्त इति । एतन्मनसि कृत्वैषु सर्वेष्वन्तेषु मध्येषु परिख्यायत इति होवाच ।<br><br>ननु कथं युक्तं शिष्ययोर्विपरीतग्रहणमनुज्ञातुं प्रजापतेर्विगतदोषस्याचार्यस्य सतः ?<br><br>सत्यमेवं नानुज्ञातम् । | और उसे ग्रहणकर अपने विचारको पुष्ट करनेके लिये प्रजापतिसे पूछा, 'हे भगवन् ! यह जो पुरुष जलमें परिख्यात—'परि'—सब ओर 'ख्यात'—प्रतीत होता है और जो यह दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देता है तथा जो खड्गादि [स्वच्छ पदार्थों] में दीखता है इन सबमें आपका बतलाया हुआ आत्मा कौन है ? अथवा इन सबमें एक ही आत्मा है ?'<br><br>इस प्रकार पूछे जानेपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जो नेत्रान्तर्गत द्रष्टा बतलाया है वही आत्मा है'* इस बातको मनमें रखकर ही उसने कहा कि 'वह इन सभीके भीतर दिखायी देता है ।'<br><br>शङ्का—किंतु निर्दोष आचार्य होकर भी प्रजापतिका अपने शिष्योंके विपरीत ग्रहणका अनुमोदन करना कैसे उचित हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह ठीक है, परंतु प्रजापतिने उसका अनुमोदन नहीं किया । |
* इस उक्तिसे प्रजापतिने यह सूचित कर दिया है कि तुम मेरा अभिप्राय नहीं समझे, मैंने द्रष्टाको आत्मा बतलाया है और तुम दृश्यको आत्मा समझ बैठे हो।