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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया हुआ—भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न होकर स्वप्न नहीं देखता उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे व्याप्त हो जाता है ॥ ३ ॥

| तत्तत्रैवं सति यत्र यस्मिन् काल एतत्स्वप्नमयं जीवः सुप्तो भवति। स्वापस्य द्विप्रकारत्वाद्विशेषणं समस्त इति; उपसंहृतसर्वकरणवृत्तिरित्येतत् । अतो बाह्यविषयसम्पर्कजनितकालुष्याभावात्सम्यक् प्रसन्नः सम्प्रसन्नो भवति । अत एव स्वप्नं विषयाकाराभासं मानसं स्वप्नप्रत्ययं न विजानाति नानुभवतीत्यर्थः। यदैवं सुप्तो भवत्यासु सौरतेजःपूर्णासु यथोक्तासु नाडीषु तदा | 'तत्'—उस अवस्थामें ऐसा होनेपर वहाँ—जिस समय यह जीव इस स्वप्नावस्था अर्थात् निद्राको प्राप्त होकर सो जाता है । निद्रा* दो प्रकारकी है इसलिये यहाँ 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है । तात्पर्य यह है कि जिस समय वह, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंका उपसंहार हो गया है, ऐसा हो जाता है; इसलिये बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे प्राप्त हुई मलिनताका अभाव हो जानेके कारण यह सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न-सम्प्रसन्न होता है; तात्पर्य यह है कि इसीलिये यह स्वप्न—विषयाकारसे भासित होनेवाले मानसिक स्वप्नप्रत्ययको नहीं जानता, अर्थात् उसका अनुभव नहीं करता । जिस समय इस प्रकार सो जाता है उस समय सूर्यके तेजसे पूर्ण हुई इन पूर्वोक्त नाड़ियोंमें सृप्त अर्थात् प्रविष्ट होता है, तात्पर्य यह है कि वह |


* निद्राकी दो वृत्तियाँ हैं—दर्शनवृत्ति यानी स्वप्न और अदर्शनवृत्ति—गाढ सुषुप्ति । यहाँ दर्शनवृत्तिकी व्यावृत्तिके लिये 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है ।

खण्ड ६ ]                      शाङ्करभाष्यार्थ                      ८५१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सुप्तः प्रविष्टा नाडीभिर्द्वारभूताभिर्हृद्याकाशं गतो भवतीत्यर्थः। न ह्यन्यत्र सत्सम्पत्तेः स्वप्नादर्शनमस्तीति सामर्थ्यान्नाडीष्विति सप्तमी तृतीयाया परिणम्यते ।इन द्वारभूत नाड़ियोंसे हृदयाकाशमें पहुँच जाता है । सत्सम्पत्ति (सत्‌को प्राप्त हो जाने) के सिवा और कहीं स्वप्नका अदर्शन नहीं होता— इस सामर्थ्यसे ‘नाडीषु’ इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे [‘नाडीभि:’ इस प्रकार] तृतीयाके रूपमें बदल ली जाती है ।
तं सता सम्पन्नं न कश्चन न कश्चिदपि धर्माधर्मरूपः पाप्मा स्पृशतीति स्वरूपावस्थितत्वात्तदात्मनः। देहेन्द्रियविशिष्टं हि सुखदुःखकार्यप्रदानेन पाप्मा स्पृशतीति न तु सत्सम्पन्नं स्वरूपावस्थं कश्चिदपि पाप्मा स्प्रष्टुमुत्सहते; अविषयत्वात् । अन्यो ह्यन्यस्य विषयो भवति न त्वन्यत्वं केनचित्कुतश्चिदपि सत्सम्पन्नस्य । स्वरूपप्रच्यवनं त्वात्मनो जाग्रत्स्वप्नावस्थां प्रति गमनं बाह्यविषयप्रतिबोधोऽविद्याकाम-सत्‌को प्राप्त हुए उस प्राणीको कोई भी धर्माधर्मरूप पाप स्पर्श नहीं करता, क्योंकि उस अवस्थामें आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है । जो जीव देह और इन्द्रियोंसे विशिष्ट है उसीको सुख-दुःखरूप अपने कार्य प्रदान करके पाप स्पर्श कर सकता है । सत्‌को प्राप्त हुए स्वरूपावस्थित आत्माको स्पर्श करनेका कोई भी पाप साहस नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसका विषय नहीं है । अन्य ही अन्यका विषय हुआ करता है और सत्‌को प्राप्त हुए जीवका किसीसे भी किसी भी कारणसे अन्यत्व है नहीं । आत्माका जाग्रत् या स्वप्नावस्थाको प्राप्त होना तथा बाह्य विषयोंको अनुभव करना ही स्वरूपसे च्युत होना है, क्योंकि अविद्यारूप काम और कर्मका बीज