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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८४० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८

८४०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ८

| भिनिष्पद्यते । विज्ञप्त्यात्मज्यो-<br>तिःस्वरूपमहरिवाहः सदैकरूपं<br>विदुषः सम्पद्यत इत्यर्थः । सकृ-<br>द्विभातः सदा विभातः सदैकरूपः<br>स्वेन रूपेणैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥ | हो जाती है । तात्पर्य यह है कि<br>विद्वान्‌के लिये वह दिनके समान<br>विज्ञानात्मज्योतिःस्वरूप दिन अर्थात्<br>सर्वदा एक रूप ही हो जाता है,<br>क्योंकि यह ब्रह्मलोक अपने<br>स्वाभाविकरूपसे सकृद्विभातः — सदा<br>भासमान अर्थात् सदा एक रूप<br>है ॥ २ ॥ |


तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामे-<br>वैष ब्रह्मलोकस्तेषाग्ँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो<br>भवति ॥ ३ ॥

वहाँ ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा [शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं उन्हींको यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति हो जाती है ॥ ३ ॥

| तत्तत्रैवं यथोक्तं ब्रह्मलोकं ब्रह्मच-<br>र्येण स्त्रीविषयतृष्णात्यागेन शास्त्रा-<br>चार्योपदेशमनुविन्दन्ति स्वात्म-<br>संवेद्यतामापादयन्ति ये तेषामेव<br>ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदामेष<br>ब्रह्मलोकः । नान्येषां स्त्रीविषय-<br>सम्पर्कजाततृष्णानां ब्रह्मविदाम- | वहाँ ऐसा होनेके कारण जो<br>इस पूर्वोक्त ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्य—<br>स्त्रीविषयक तृष्णाके त्यागद्वारा<br>शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशके<br>अनन्तर जानते हैं अर्थात् स्वात्मसं-<br>वेद्यताको प्राप्त कराते हैं उन<br>ब्रह्मचर्यरूप साधनसम्पन्न ब्रह्मो-<br>पासकोंको ही यह ब्रह्मलोक प्राप्त<br>होता है। अन्य स्त्रीविषयक सम्पर्क-<br>जनित तृष्णावालोंको ब्रह्मोपासक<br>होनेपर भी इसकी प्राप्ति नहीं |

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१


पीत्यर्थः । तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवतीत्युक्तार्थम् । तस्मात्परमेतत् साधनं ब्रह्मचर्यं ब्रह्मविदामित्यभिप्रायः ॥ ३ ॥होती—ऐसा इसका तात्पर्य है । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति हो जाती है—इस प्रकार इसका अर्थ पहले कहा जा चुका है । अतः अभिप्राय यह है कि यह ब्रह्मचर्य ब्रह्मोपासकोंका परम साधन है ॥ ३ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्थ-
खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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पञ्चम खण्ड

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यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यदृष्टि

य आत्मा सेतुत्वादिगुणैः स्तुतस्तत्प्राप्तये ज्ञानसहकारिसाधनान्तरं ब्रह्मचर्याख्यं विधातव्यमित्याह । यज्ञादिभिश्च तत्स्तौति कर्तव्यार्थम्—जिस आत्माकी सेतुत्वादि गुणोंसे स्तुति की गयी है उसकी प्राप्तिके लिये ज्ञानसे इतर ज्ञानके सहकारी साधन ब्रह्मचर्यका विधान करना आवश्यक है; इसीसे श्रुति कहती है; तथा उसकी कर्तव्यताके लिये यज्ञादिरूपसे उसकी स्तुति करती है—

अथ यद्यज्ञं इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥

अब, [ लोकमें ] जिसे 'यज्ञ' ( परमपुरुषार्थका साधन ) कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके द्वारा ही उस ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है । और जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते लोके परमपुरुषार्थसाधनं कथयन्ति शिष्टास्तद्ब्रह्मचर्यमेव । यज्ञस्यापिअब, जिसे 'यज्ञ' ऐसा कहा जाता है अर्थात् लोकमें जिसे शिष्ट पुरुष परम पुरुषार्थका साधन बतलाते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है ।

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४३


यत्फलं तद्ब्रह्मचर्यवाँल्लभतेऽतो यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति प्रतिपत्तव्यम् । कथं ब्रह्मचर्यं यज्ञ इत्याह । ब्रह्मचर्येणैव हि यस्माद्यो ज्ञाता स तं ब्रह्मलोकं यज्ञस्यापि पारम्पर्येण फलभूतं विन्दते लभते ततो यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति । यो ज्ञातेत्यक्षरानुवृत्तेर्यज्ञः ब्रह्मचर्यमेव ।<br><br>अथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् । कथम्; ब्रह्मचर्येणैव साधनेन तमीश्वरमिष्ट्वा पूजयित्वाथवैषणामात्मविषयां कृत्वा तमात्मानमनुविन्दते । एषणादिष्टमपि ब्रह्मचर्यमेव ॥ १ ॥यज्ञका भी जो फल है उसे ब्रह्मचर्यवान् पुरुष प्राप्त करता है, इसलिये यज्ञको भी ब्रह्मचर्य ही समझना चाहिये । ब्रह्मचर्य यज्ञ किस प्रकार है ? —इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि जो ज्ञानवान् है वह उस ब्रह्मलोकको, जो कि परम्परासे यज्ञका भी फलस्वरूप है, ब्रह्मचर्यसे ही प्राप्त करता है; अतः यह भी ब्रह्मचर्य ही है। 'यो ज्ञाता' इन अक्षरोंकी अनुवृत्ति होनेके कारण ब्रह्मचर्यको ही यज्ञ कहा गया है ।<br><br>तथा जिसे 'इष्ट' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है । किस प्रकार ? —पुरुष उस ईश्वरको ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ही यजन कर-पूजकर अथवा आत्मविषयक एषणा कर उस आत्माको शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशानुसार साक्षात् जानता है । उस एषणाके कारण इष्ट भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ १ ॥

अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्य वात्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥