सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्यदेभिरच्छादयँस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥

[ एक बार ] मृत्युसे भय मानते हुए देवताओंने त्रयीविद्यामें प्रवेश किया। उन्होंने अपनेको छन्दोंसे आच्छादित कर लिया। देवताओंने जो उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोंका छन्दपन है। [ अर्थात् देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रोंका नाम छन्द हुआ है ] ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
देवा वै मृत्योर्मारकाद्विभ्यतः किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—त्रयीं विद्यां त्रयीविहितं कर्म प्राविशन् प्रविष्टवन्तो वैदिकं कर्म प्रारब्धवन्त इत्यर्थः, तन्मृत्योस्त्राणं मन्यमानाः। किं च ते कर्मण्य-विनियुक्तैश्छन्दोभिर्मन्त्रैर्जपहोमादि कुर्वन्त आत्मानं कर्मान्तरेष्वच्छादयंश्छादितवन्तः। यद्यस्मादेभिर्मन्त्रैरच्छादयंस्तत्तस्माच्छन्दसां मन्त्राणां छादनाच्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥प्रसिद्ध देवताओंने मारक मृत्युसे भय मानते हुए क्या किया ? यह बतलाया जाता है—उन्होंने त्रयी विद्यामें—वेदत्रयीद्वारा प्रतिपादित कर्ममें प्रवेश किया। अर्थात् वैदिक कर्मको ही मृत्युसे बचनेका साधन समझकर उन्होंने उसीका आरम्भ कर दिया। तथा कर्ममें जिनका विनियोग नहीं है उन छन्दों—मन्त्रों—से जप एवं होमादि करते हुए उन्होंने अपनेको कर्मान्तरोंमें आच्छादित कर दिया। क्योंकि उन्होंने अपनेको इन मन्त्रोंसे आच्छादित कर दिया था, इसलिये छादन करनेके कारण ही छन्दों यानी मन्त्रोंका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥
<div align="center">—: ० :—</div>

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥

जिस प्रकार [मछेरा] जलमें मछलियोंको देख लेता है, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कर्मोंमें लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुः सम्बन्धी कर्मोंसे निवृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) में ही प्रवेश किया॥ ३॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्यथा लोके मत्स्यघातको मत्स्यमुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद्दण्डिशोदकस्रावोपायसाध्यं मन्यमानः, एवं पर्यपश्यद्दृष्टवान्मृत्युः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः। क्वासौ देवान्ददर्श? इत्युच्यते—ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः । ते नु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मृत्योश्चिकीर्षितं विदितवन्तः । विदित्वा च त ऊर्ध्वा व्यावृत्ताः कर्मभ्य ऋचः साम्नोजिस प्रकार लोकमें बंसी लगाने और जल उलीचने आदि उपायोंसे मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने कर्मपरायण देवताओंको वहाँ [छिपे हुए] देख लिया, अर्थात् मृत्युने यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देवताओंको कहाँ देखा ? यह बतलाया जाता है—ऋक्, साम और यजुमें अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्ममें। वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने 'मृत्यु क्या करना चाहता है ?' यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त