छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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| नैव सन्तीत्यतो नाविजानन्सत्यं वदति । विजानन्नेव सत्यं वदति ।<br><br>न च तत्सत्यविज्ञानमविजिज्ञासितमप्रार्थितं ज्ञायत इत्याह—<br><br>विज्ञानंत्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । यद्येवं विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति । एवं सत्यादीनां चोत्तरोत्तराणां करोत्यन्तानां पूर्वपूर्वहेतुत्वं व्याख्यातव्यम् ॥ १ ॥ | तो हैं ही नहीं। अतः परमार्थको बिना जाने कोई सत्य नहीं बोल सकता। सत्यका विशेष ज्ञान होनेपर ही पुरुष सत्य बोल सकता है।<br><br>किन्तु वह सत्यविज्ञान बिना जिज्ञासा किये—बिना उसकी प्रार्थना किये नहीं जाना जाता; इसीसे कहते हैं कि 'विज्ञानकी* ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'यदि ऐसी बात है, तो भगवन्! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करता हूँ। इसी प्रकार सत्यसे लेकर [आगे बाईसवें खण्डके] 'करोति' पर्यन्त उत्तरोत्तर पदार्थोंके पूर्व-पूर्व पदार्थ कारण हैं—ऐसी व्याख्या करनी चाहिये ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
* 'विज्ञान' शब्द अष्टम खण्डके प्रथम मन्त्रमें भी आया है। परन्तु वहाँ उसका तात्पर्य केवल शास्त्रज्ञान है और यहाँ विशेष ज्ञान अर्थात् वास्तविक ज्ञान है।
अष्टादश
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मति ही जानने योग्य है.
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी वह विशेषरूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै मनुत इति । मतिर्मननं तर्को मन्तव्यविषय आदरः ॥१॥ | जिस समय मनन करता है इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन—तर्क—मन्तव्य विषयके प्रति आदर। |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥
एकोनविंश खण्ड
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श्रद्धा ही जानने योग्य है
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दध-
देव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है तभी वह मनन करता है; बिना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करता । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥
| आस्तिक्यबुद्धिः श्रद्धा ॥१॥ | आस्तिक्य बुद्धिका नाम श्रद्धा है ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकोन-
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
विंश खण्ड
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निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्द-
धाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञा-
सितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है तभी वह श्रद्धा करता है; बिना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
| निष्ठा गुरुशुश्रूषादिस्तत्परत्वं <br> ब्रह्मविज्ञानाय ॥ १ ॥ | निष्ठा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते हैं। उसमें ब्रह्मविज्ञानके लिये तत्पर रहना ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥
एकविंश
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कृति ही जानने योग्य है
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है उस समय वह निष्ठा भी करने लगता है; बिना किये किसीकी निष्ठा नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है । अतः कृतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ?' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेष-रूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै करोति । कृतिरिन्द्रियसंयमश्चित्तैकाग्रताकरणं च । सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि यथोक्तानि भवन्ति विज्ञानावसानानि ॥ १ ॥ | जिस समय मनुष्य करता है । 'कृति' इन्द्रियसंयम और चित्तकी एकाग्रता करनेको कहते हैं । उसके होनेपर ही उपर्युक्त [विपरीत क्रमसे] निष्ठासे लेकर विज्ञानपर्यन्त समस्त साधन होते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
द्वाविंशं
सुख ही जानने योग्य है
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; बिना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख पाकर (पानेकी आशा रखकर) ही करता है; अतः सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
| सापि कृतिर्यदा सुखं लभते | वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय ऐसा |
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| सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं | मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय सुख प्राप्त |
| लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा | करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक कृति दृष्टफलजनित |
| भवतीत्यर्थः । यथा दृष्टफल- | सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें भी बिना सुख मिले |
| सुखाकृतिस्तथेहापि नासुखं | कोई नहीं करता। यद्यपि वह फल भविष्यत्कालिक होता है तो भी |
| लब्ध्वा करोति । भविष्यदपि | 'लब्ध्वा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक क्रियारूपसे] कहा जाता |
| फलं लब्ध्वेत्युच्यते तदुद्दिश्य | है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। |
| प्रवृत्त्युपपत्तेः । |