छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| बलं वाव विज्ञानाद्भूयः । | बल ही विज्ञानसे उत्कृष्ट है। |
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| बलमित्यन्नोपयोगजनितं मनसो विज्ञेये प्रतिभानसामर्थ्यम् । अनशनात् "ऋगादीनि न वै मा प्रतिभान्ति भोः" (छा० उ० ६।७।२) इति श्रुतेः। शरीरेऽपि तदेवोत्थानादि सामर्थ्यं यस्माद्विज्ञानवतां शतमप्येकः प्राणी बलवानाकम्पयते यथा हस्ती मत्तो मनुष्याणां शतं समुदितमपि । | अन्नके उपयोगसे प्राप्त हुई मनकी विज्ञेय पदार्थके प्रतिभानकी शक्तिका नाम 'बल' है; क्योंकि अनशन करनेके कारण "भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता" ऐसी [छठे अध्यायमें श्वेतकेतुका वाक्यरूप] श्रुति है। शरीरमें भी वह बल ही उठने आदिका सामर्थ्य है, क्योंकि सौ विज्ञानवानोंको भी एक ही बलवान् प्राणी इस प्रकार कम्पायमान कर देता है जैसे एकत्रित हुए सौ मनुष्योंको एक मत्त हाथी । |
| यस्मादेवमन्नाद्युपयोगनिमित्तं बलं तस्मात्स पुरुषो यदा बली बलेन तद्वान्भवत्यथोत्थातोत्थानस्य कर्तोत्तिष्ठंश्च गुरूणामाचार्यस्य च परिचरिता परिचरणस्य शुश्रूषायाः कर्ता भवति परिचरन्नुपसत्ता तेषां समीपगोऽन्तरङ्गः प्रियो भवतीत्यर्थः । | क्योंकि अन्नादिके उपयोगके कारण होनेवाला बल ऐसा है इसलिये यह पुरुष जिस समय बली अर्थात् बलसे बलयुक्त होता है तो वह उत्थाता अर्थात् उत्थान करनेवाला होता है । उत्थान करनेवाला होकर वह गुरुजन और आचार्यका परिचारक-परिचर्या यानी शुश्रूषा करनेवाला होता है ! परिचर्या करनेपर उपसत्ति करनेवाला-उनके समीप पहुँचनेवाला-उनका अन्तरङ्ग अर्थात् प्रिय होता है । |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४७
| उपसीदंश्च सामीप्यं गच्छन्नेकाग्रतयाचार्यस्यान्यस्य चोपदेष्टुर्गुरोर्द्रष्टा भवति । ततस्तदुक्तस्य श्रोता भवति । तत इदमेभिरुक्तमेवमुपपद्यत इत्युपपत्तितो मन्ता भवति मन्वानश्च बोद्धा भवत्येवमेवेदमिति । तत एवं निश्चित्य तदुक्तार्थस्य कर्तानुष्ठाता भवति विज्ञातानुष्ठानफलस्यानुभविता भवतीत्यर्थः । किञ्च बलस्य माहात्म्यं बलेन वै पृथिवी तिष्ठतीत्याद्यृज्वर्थम् ॥ १ ॥ | उपसन्न होने अर्थात् समीप जानेपर वह एकाग्रभावसे आचार्य अथवा किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका दर्शन करनेवाला होता है । फिर वह उनके कथनको श्रवण करनेवाला होता है । तत्पश्चात् 'इनका यह कथन इस प्रकार उपपन्न है' इस प्रकार युक्तिपूर्वक मनन करनेवाला होता है । तथा मनन करनेपर 'यह बात ऐसी ही है' इस प्रकार उसे जाननेवाला होता है । फिर इस प्रकार निश्चय कर वह उनकी कही हुई बातका कर्ता—अनुष्ठान करनेवाला होता है, तथा विज्ञाता यानी अनुष्ठानके फलका अनुभव करनेवाला होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । इसके सिवा बलकी महिमा इस प्रकार है—बलसे पृथिवी स्थित है—इत्यादि शेष अर्थ सरल है ॥१॥ |
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स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥