छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| ७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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उद्गीथाक्षरोंमें द्युलोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि
| त्रयाणां श्रुत्युक्तानि सामान्यानि तानि तेनानुरूपेण शेषेष्वपि द्रष्टव्यानि— | इन तीनोंकी समानता श्रुतिने बतलायी है। उन्हींके अनुसार शेष स्थानोंमें भी समझनी चाहिये— |
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द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थँ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीरृग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥
द्यौ ही 'उत' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत' है, वायु 'गी' है और अग्नि 'थ' है। सामवेद ही 'उत' है, यजुर्वेद 'गी' है और ऋग्वेद 'थ' है। इन अक्षरोंको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् 'उद्गीथ' इस प्रकार इन उद्गीथाक्षरोंकी उपासना करता है उसके लिये वाणी, जो [ऋग्वेदादि] वाक्का दोह है, उसका दोहन करती है तथा वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ७ ॥
| द्यौरेव उत्, उच्चैःस्थानात् । | ऊँचे स्थानवाला होनेके कारण द्युलोक ही 'उत्' है, |
| अन्तरिक्षं गीर्गिरणाल्लोकानाम् । | लोकोंका गिरण करने (निगलने) से अन्तरिक्ष 'गी' है और |
| पृथिवीथं प्राणिस्थानात् । आदित्य एव उत्; ऊर्ध्वत्वात् । वायुर्गीर- | प्राणियोंका स्थान होनेके कारण पृथिवी 'थ' है। ऊँचा होनेके कारण आदित्य ही 'उत्' है, |
| ग्न्यादीनां गिरणात् । अग्निस्थं यज्ञकर्मावस्थानात् । सामवेद एव उत्, स्वर्गसंस्तुतत्वात् । यजुर्वेदो | अग्नि आदिको निगलनेके कारण वायु 'गी' है और यज्ञसम्बन्धी कर्मका अवस्थान (आश्रय) होनेसे अग्नि ही 'थ' है तथा स्वर्गमें स्तुत होनेके कारण सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है, क्योंकि |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
| गीर्यजुषां प्रत्तस्य हविषो देवता-नां गिरणात् । ऋग्वेदस्थम्,<br><br>ऋच्यध्यूढत्वात्साम्नः ।<br><br> उद्गीथाक्षरोपासनफलमधु-नोच्यते—दुग्धे दोग्ध्यस्मै साधकाय । का सा ? वाक्, कम् ? दोहम्, कोऽसौ दोहः ? इत्याह—यो वाचो दोहः । ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फलमित्य-भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं स्वयमेव वाग्दोग्ध्यात्मानमेव दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता-न्नोऽन्नादश्च दीप्ताग्निर्भवति य एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त-गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स-नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ | यजुर्वेदियोंके दिये हुए हविको देवता-लोग निगलते हैं तथा ऋग्वेद 'थ' है; क्योंकि ऋक्में ही साम अधिष्ठित है ।<br><br> अब उद्गीथाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाया जाता है—इस साधक-के लिये दोहन करती है, कौन ? वाक्, किसका दोहन करती है ? दोहका, वह दोह क्या है ? इसपर कहते हैं—जो वाणीका दोह है; अभिप्राय यह है कि जो ऋग्वेदादि शब्दसे साध्य फल है, वह वाणीका दोह है, उसे वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेहीको दुहती है । यही नहीं वह अन्नवान्—बहुत-से अन्न-वाला और अन्नका भोक्ता भी हो जाता है, उसकी जठराग्नि उद्दीप्त रहती है, जो इन उपर्युक्त उद्गीथा-क्षरोंकी इन्हें उपर्युक्त गुणोंसे विशिष्ट जानकर, 'उद्गीथ' इस रूपसे उपा-सना करता है ॥ ७ ॥ |
सकामोपासनाका क्रम
अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ ८ ॥
अब निश्चय ही कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णन किया जाता है—] अपने उपगन्तव्यों (ध्येयों) की इस प्रकार उपासना