छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| यिकारभ्यते, येन सर्वविज्ञान-<br>साधनशक्तिसम्पन्नस्यापि नार-<br>दस्य देवर्षेः श्रेयो न बभूव<br>येनोत्तमाभिजनविद्यावृत्तसाधन-<br>शक्तिसम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हि-<br>त्वा प्राकृतपुरुषवत्सनत्कुमार-<br>मुपससाद श्रेयःसाधनप्राप्तये-<br>ऽतः प्रख्यापितं भवति निर-<br>तिशयप्राप्तिसाधनत्वमात्मवि-<br>द्याया इति । | आरम्भ किया जाता है, जिससे कि<br>सम्पूर्ण विज्ञानरूप साधनोंकी<br>शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी देवर्षि<br>नारदका कल्याण नहीं हुआ, इसीसे<br>वे उत्तम कुल, विद्या, आचार और<br>नाना प्रकारके साधनोंकी सामर्थ्य-<br>रूप सम्पत्तिसे होनेवाले अभिमान-<br>को त्यागकर श्रेयःसाधनकी प्राप्तिके<br>लिये एक साधारण पुरुषके समान<br>सनत्कुमारजीके समीप गये। इससे<br>श्रेयःप्राप्तिमें आत्मविद्याका निरतिशय<br>साधनत्व सूचित होता है। |
ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तँहोवाच यद्वेत्थ तेन नोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥
‘हे भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये’ ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये। उनसे सनत्कुमारजीने कहा—‘तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास उपदेश लेनेके लिये आओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा’ तब नारदने कहा—॥ १ ॥
| अधीह्यधीष्व भगवो भगवन्नि-<br>ति ह किलोपससाद । अधीहि<br>भगव इति मन्त्रः । सनत्कुमारं<br>योगीश्वरं ब्रह्मिष्ठं नारद उपस-<br>न्नवान् । तं न्यायत उपसन्नं | ‘हे भगवन् ! मुझे अध्ययन<br>कराइये’ ऐसा कहते हुए नारदजी<br>ब्रह्मनिष्ठ योगीश्वर सनत्कुमारके प्रति<br>उपसन्न हुए अर्थात् [ शिष्यरूपसे ]<br>उनके समीप गये । ‘अधीहि भगवः’<br>यह उपसत्तिका मन्त्र है । अपने<br>प्रति नियमानुसार उपसन्न हुए उन |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१३
| होवाच यदात्मविषये किञ्चिद्वेत्थ<br><br>तेन तत्प्रख्यापनेन मामुपसीदे-<br><br>दमहं जान इति, ततोऽहं भवतो<br><br>विज्ञानात्ते तुभ्यमूर्ध्वं वक्ष्यामि, इ-<br><br>त्युक्तवति स होवाच नारदः ॥१॥ | नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—<br>'तुम आत्माके विषयमें जो कुछ<br>जानते हो उसे बतलाते हुए अर्थात्<br>ऐसा प्रकट करते हुए मेरे पास<br>उपदेश लेनेके लिये आओ; मैं यह<br>जानता हूँ' तब मैं तुम्हें तुम्हारे<br>ज्ञानसे आगे उपदेश करूँगा।'<br>सनत्कुमारजीके ऐसा कहनेपर<br>नारदजी बोले ॥ १ ॥ |
ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद १४ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य १४ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या १२ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥
'भगवन् ! मुझे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद याद है, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गरुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ' ॥ २ ॥
| ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि स्मरामि<br><br>यद्वेत्थेति विज्ञानस्य पृष्टत्वात् ।<br><br>तथा यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं<br><br>चतुर्थं वेदं वेदशब्दस्य प्रकृतत्वा- | हे भगवन् ! मैं ऋग्वेदका अध्ययन<br>कर चुका हूँ अर्थात् मुझे ऋग्वेद<br>स्मरण है [ यहाँ अध्ययनवाचक<br>पदका स्मरण अर्थ क्यों किया गया ?<br>उत्तर— ] क्योंकि 'यद्वेत्थ' ऐसा<br>कहकर विज्ञानके विषयमें प्रश्न<br>किया गया है । तथा यजुर्वेद |