छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथ यत्राविद्याविषयेऽन्योऽन्येनान्यत्पश्यतीति तदल्पमविद्याकालभावीत्यर्थः । यथा स्वप्नदृश्यं वस्तु प्राक् प्रबोधात्तत्कालभावीति तद्वत् । तत एव तन्मर्त्यं विनाशि स्वप्नवस्तुवदेव तद्विपरीतो भूमा यस्तदमृतम् । तच्छब्दोऽमृतत्वपरः । | किंतु जहाँ अविद्याके राज्यमें अन्य अन्यको अन्यके द्वारा देखता है वह अल्प है, तात्पर्य यह है कि वह केवल अविद्याके समय ही रहनेवाला है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखलायी देनेवाली वस्तु जागनेसे पूर्व स्वप्नकालमें ही रहनेवाली होती है उसी प्रकार [ उसे जानना चाहिये । इसीसे वह स्वप्नके पदार्थके समान ही मर्त्य—विनाशी है । उसके विपरीत जो भूमा है वह अमृत । 'तत्' शब्द अमृतत्वपरक है [ इसीसे नपुंसकलिङ्गका प्रयोग किया गया ] । |
| स तर्ह्येवंलक्षणो भूमा हे भगवन् कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्युक्तवन्तं नारदं प्रत्याह सनत्कुमारः—स्वे महिम्नीति; स्व आत्मीये महिम्नि माहात्म्ये विभूतौ प्रतिष्ठितो भूमा। यदि प्रतिष्ठामिच्छसि क्वचिद्यदि वा परमार्थमेव पृच्छसि न महिम्न्यपि प्रतिष्ठित इति ब्रूमः । | 'तो, हे भगवन् ! वह ऐसे लक्षणवाला भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ?' इस प्रकार पूछते हुए नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—'अपनी महिमामें।' तो वह भूमा 'स्वे'—अपनी 'महिम्नि'—महिमा अर्थात् विभूतिमें प्रतिष्ठित है । और यदि कहीं उसकी प्रतिष्ठा जानना चाहते हो—अथवा यदि परमार्थतः ही पूछते हो तो हमारा यह कथन है कि वह अपनी महिमामें भी प्रतिष्ठित नहीं |
खण्ड २४] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१
| अप्रतिष्ठितोऽनाश्रितो भूमा क्वचिदपीत्यर्थः ॥ १ ॥ | है। तात्पर्य यह है कि 'भूमा अप्रतिष्ठित है अर्थात् कहीं भी आश्रित नहीं है' ॥ १ ॥ |
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| यदि स्वमहिम्नि प्रतिष्ठितो भूमा कथं तर्ह्यप्रतिष्ठ उच्यते, शृणु | 'यदि भूमा अपनी महिमामें प्रतिष्ठित है तो उसे अप्रतिष्ठित क्यों कहा जाता है?' सुनो— |
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गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
‘इस लोकमें ‘गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर—इनका नाम भी महिमा है। किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है। मैं तो यह कहता हूँ’—ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ २ ॥
| गोअश्वादीह महिमेत्याचक्षते ।<br><br>गावश्चाश्वाश्च गोअश्वं द्वन्द्वैकवद्भावः। सर्वत्र गवाश्वादि महिमेति प्रसिद्धम्। तदाश्रितस्तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति यथा नाहमेवं | 'इस लोकमें गो-अश्वादिको महिमा कहते हैं। गो और अश्वको 'गोअश्व' कहते हैं। इन दोनों शब्दोंका द्वन्द्व समासमें एकवद्भाव* हुआ है। सर्वत्र गौ और अश्व आदि ही महिमा हैं इस प्रकार प्रसिद्ध है। जिस प्रकार चैत्र [नामका कोई पुरुष] उनके |
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* यहाँ यह प्रश्न होता है कि 'गावश्च अश्वाश्च' ऐसा विग्रह करके पुंल्लिङ्ग एवं बहुवचनान्त शब्दोंका द्वन्द्वसमास हुआ है, ऐसी दशामें 'गोअश्वम्' यह एकवचनान्त नपुंसकलिङ्ग प्रयोग कैसे हुआ ? इसीका उत्तर देते हुए कहते हैं कि एकवद्भाव हुआ है। 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ एकवद्भाव किया गया है, इससे एकवचनान्त हो गया है तथा जहाँ एकवद्भाव होता है वहाँ 'स नपुंसकम्' इस सूत्रके अनुसार नपुंसकता भी हो जाती है।